सोमवार, 8 अगस्त 2011

"आंखें" बंद किये देख रहा हूं, चापलूसों को.......

मैं देख रहा हूं.....
"भाव" के "अभाव" में हौले से जन्मता है "दुर्भाव",
"दुर्भावना" के दबाव में सिसक रही है "भावना",
और आप कहते हैं कि....
"भावना" को समझिये "शब्दों" में क्या रखा है....!
हां, गलत कहते हैं आप,
सब "शब्दों" का ही "खेल" है,
शब्दों ने ही "अलग" किया,
और अब तो जनाब "शब्दों" में ही "मेल" है,
"भावना", "संवेदना" सब "खत्म" हो रही हैं
और मैं सिर्फ और सिर्फ "आंखें" बंद किये देख रहा हूं, चापलूसों को.......
और मैं सिर्फ और सिर्फ "आंखें" बंद किये देख रहा हूं, चापलूसों को.......





2 टिप्‍पणियां:

  1. सब "शब्दों" का ही "खेल" है, .......
    "आंखें" बंद किये देख रहा हूं, चापलूसों को.......

    बढ़िया है !!!!!

    http://sahitya-varidhi-sudhakar.blogspot.com

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