गुरुवार, 27 जून 2013

एक बार एक किसान की घड़ी कहीं खो गयी. वैसे
तो घडी कीमती नहीं थी पर किसान उससे
भावनात्मक रूप से
जुड़ा हुआ था और किसी भी तरह उसे वापस
पाना चाहता था.
उसने खुद भी घडी खोजने का बहुत प्रयास
किया, कभी कमरे में
खोजता तो कभी बाड़े तो कभी अनाज के ढेर में
….पर तामाम
कोशिशों के बाद भी घड़ी नहीं मिली. उसने
निश्चय
किया की वो इस काम में बच्चों की मदद
लेगा और उसने आवाज
लगाई , ” सुनो बच्चों , तुममे से जो कोई
भी मेरी खोई घडी खोज
देगा उसे मैं १०० रुपये इनाम में दूंगा.”
फिर क्या था , सभी बच्चे जोर-शोर दे इस काम
में लगा गए…वे
हर जगह की ख़ाक छानने लगे , ऊपर-नीचे ,
बाहर, आँगन में ..हर
जगह…पर घंटो बीत जाने पर भी घडी नहीं मिली.
अब लगभग सभी बच्चे हार मान चुके थे और
किसान
को भी यही लगा की घड़ी नहीं मिलेगी, तभी एक
लड़का उसके
पास आया और बोला , ” काका मुझे एक
मौका और दीजिये, पर
इस बार मैं ये काम अकेले ही करना चाहूँगा.”
किसान का क्या जा रहा था, उसे तो घडी चाहिए
थी, उसने तुरंत
हाँ कर दी.
लड़का एक-एक कर के घर के कमरों मेंजाने
लगा…और जब वह
किसान के शयन कक्ष से निकला तो घड़ी उसके
हाथ में थी.
किसान घड़ी देख प्रसन्न हो गया औरअचरज से
पूछा ,” बेटा,
कहाँ थी ये घड़ी , और जहाँ हम सभी असफल
हो गए तुमने इसे
कैसे ढूंढ निकाला ?”
लड़का बोला,” काका मैंने कुछ नहीं किया बस मैं
कमरे में गया और
चुप-चाप बैठ गया, और घड़ी की आवाज़पर ध्यान
केन्द्रित करने
लगा , कमरे में शांति होने के कारणमुझे
घड़ी की टिक-टिक सुनाई
दे गयी , जिससे मैंने
उसकी दिशा काअंदाजा लगा लिया और
आलमारी के पीछे गिरी ये घड़ी खोज निकाली.”
Friends, जिस तरह कमरे की शांति घड़ी ढूढने में
मददगार साबित
हुई उसी प्रकार मन की शांति हमें life
की ज़रूरी चीजें समझने में
मददगार होती है . हर दिन हमें अपनेलिए
थोडा वक़्त
निकालना चाहिए , जिसमे हम बिलकुल अकेले हों ,
जिसमे हम
शांति से बैठ कर खुद से बात कर सकें और अपने
भीतर
की आवाज़ को सुन सकें , तभी हम life को और
अच्छे ढंग से
जी पायेंगे...

मंगलवार, 25 जून 2013


"सचमुच, सोने की चिड़िया "था" हमारा देश.....अब नहीं"
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बदन पर "रौशनी" ओढ़ी है सबने,
अंधेरा "रूह" तक फैला हुआ है...,
सुना है और इक भूखा भिखारी,
खुदा का नाम लेते "मर" गया है।।
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दोस्तो, केदारनाथ में महामारी का डर, सामूहिक अग्नि संस्कार की तैयारी, लकड़ी घी के इंतजाम के निर्देश, पुजारियों से मदद का आग्रह...................
केदारनाथ लूटपाट, बाबाओं से लाखों बरामद, बैंक से लूटे 83 लाख, 125 रूपये का एक पराठा, 120 रूपये में पीने का पानी.......
हृदय द्रवित करती हैं ऐसी खबरें.........सचमुच, सोने की चिड़िया "था" हमारा देश.....अब नहीं
(संतोष मिश्रा)
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रविवार, 16 जून 2013


बच्ची का था इलाज महंगा, गरीब माँ-बाप ने जान ले ली
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आज जब लोग फादर्स डे की बधाईयां देते "संडे" इंज्वाय कर रहे हैं.....अगरतला में एक दिहाड़ी मजदूर और उसकी पत्नी ने छः महीने की बच्ची के इलाज का महंगा खर्च न वहन कर पाने की वजह से उसकी हत्या कर शव घर के नजदीक एक नाले में फेंक दिये जाने की घटना ने मेरे जेहन को झिंझोड़ दिया है।

पुलिस ने बीमार बच्ची के पिता लाबा देबनाथ को गिरफ्तार कर लिया जिसने पत्नी के साथ मिल कर अपनी बेटी लीना की हत्या कर उसे घर के नजदीक एक नाले में फेंकने की बात कबूल कर ली।
बच्ची के पिता लाबा ने बताया कि लीना को टिटनस का संक्रमण होने से रक्तस्त्राव हो रहा था। चिकित्सकों ने प्रत्येक दिन 1500 रूपये की दवा और 900 का एक इंजेक्शन लगाए जाने की सलाह दी थी। घर के इकलौते कमाऊ व्यक्ति एवं दिहाड़ी मजदूर लाबा को पांच सदस्यीय परिवार चलाना पड़ता है और बच्ची के इलाज का खर्च जुटाना उसकी चादर से कहीं ज्यादा था, कैसे फैलाता वह पांव। परिवार ने गांव की पंचायत तथा स्थानीय प्रशासन से मदद की गुहार लगाई थी लेकिन कोई "मदद" नहीं मिली..।

मैं सोच रहा घोटालों के इस देश में जहां डा. मनमोहन सिंह ने स्मार्ट कार्ड जैसी कई योजनाएं चलाई हैं, सभी को दो जून की रोटी मिल सके इसके सभी प्रयास किये गये हैं मगर यह भी सच है कि प्रयास जमीनी नहीं "कागजी" ज्यादा हो गये हैं......!
ऐसी हृदय विदारक घटनाएं सचमुच देश के उन सभी जिम्मेदारों को "चुल्लु भर पानी देने" विवश करती हैं जो जिम्मेदारियां लिये हैं और केवल अपने घर भर रहे हैं......, ऐसी घटनाओं के बाद भी कैसे उतरता होगा अन्न इनके गले की हलक से नीचे......? सचमुच शर्म और नैतिकता मेरे देश से उसी तरह खत्म होती जा रही जैसे इसे मिला सोने की चिड़िया का "तमगा"..................(संतोष मिश्रा) - 16 जून 2013

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

मन के नैन हजार.......: " स " से सावधान .................अजीब लग रहा हैं ...

मन के नैन हजार.......: " स " से सावधान .................
अजीब लग रहा हैं ...
: " स " से सावधान ................. अजीब लग रहा हैं न ?पर ये सच्चाई है महिलाओं के लिये पहला " स " तो " सगाई " से ही शुरू हो जाता है उससे निज...
" स " से सावधान .................
अजीब लग रहा हैं न ?पर ये सच्चाई है महिलाओं के लिये पहला " स " तो " सगाई " से ही शुरू हो जाता है उससे निजात मिलती है तो " सास " सामने आ जाती है जो "साँस " तक लेने नही देती है उनसे बची तो "सार्स " यानि चीनी की बिमारी भी इनकी पक्की सहेली होती है ,श्रंगार प्रेमी होने के कारण " सोने " से भी डर, बच गये तो नये शत्रु यानी " सफर " "सड़क " और यहाँ तक की "सहेलियाँ "भी कम खतरा नही होती ,उनका "सनम " न ले उडें ,पर सबसे बड़ा खतरा तो "सजन " के रूप में आता है फिर" शरारत " " शराब " जिनसे बचने के लिये "सजना " संवरना " पड़ता है एक और खतरा इन्तजार में ही रहता है "सौत " के रूप में ,जिससे "सपने " में भी डर लगता है |ये सभी " स " एक " सदमे " का रूप ले लेते हैं |
तभी तो कहता हूँ महिलाएं पुरुषों से ज्यादा भावुक होती हैं " संकट " में फसे व्यक्तियों को "संकट " से छुटकारे के लिये "समझाने " लगती हैं यही समझाना ही उनके लिये "संकट " बन जाता है "सफाई " भी देनी पडती है सो अलग ,है न "स " खतरनाक क्रपया "स " से दूर ही रहे ,ये भी एक विडम्बना ही ही है मेरा नाम भी तो "स " से ही है .......................

शनिवार, 22 सितंबर 2012


रविवार, 16 सितंबर 2012