एक बार एक किसान की घड़ी कहीं खो गयी. वैसे
तो घडी कीमती नहीं थी पर किसान उससे
भावनात्मक रूप से
जुड़ा हुआ था और किसी भी तरह उसे वापस
पाना चाहता था.
उसने खुद भी घडी खोजने का बहुत प्रयास
किया, कभी कमरे में
खोजता तो कभी बाड़े तो कभी अनाज के ढेर में
….पर तामाम
कोशिशों के बाद भी घड़ी नहीं मिली. उसने
निश्चय
किया की वो इस काम में बच्चों की मदद
लेगा और उसने आवाज
लगाई , ” सुनो बच्चों , तुममे से जो कोई
भी मेरी खोई घडी खोज
देगा उसे मैं १०० रुपये इनाम में दूंगा.”
फिर क्या था , सभी बच्चे जोर-शोर दे इस काम
में लगा गए…वे
हर जगह की ख़ाक छानने लगे , ऊपर-नीचे ,
बाहर, आँगन में ..हर
जगह…पर घंटो बीत जाने पर भी घडी नहीं मिली.
अब लगभग सभी बच्चे हार मान चुके थे और
किसान
को भी यही लगा की घड़ी नहीं मिलेगी, तभी एक
लड़का उसके
पास आया और बोला , ” काका मुझे एक
मौका और दीजिये, पर
इस बार मैं ये काम अकेले ही करना चाहूँगा.”
किसान का क्या जा रहा था, उसे तो घडी चाहिए
थी, उसने तुरंत
हाँ कर दी.
लड़का एक-एक कर के घर के कमरों मेंजाने
लगा…और जब वह
किसान के शयन कक्ष से निकला तो घड़ी उसके
हाथ में थी.
किसान घड़ी देख प्रसन्न हो गया औरअचरज से
पूछा ,” बेटा,
कहाँ थी ये घड़ी , और जहाँ हम सभी असफल
हो गए तुमने इसे
कैसे ढूंढ निकाला ?”
लड़का बोला,” काका मैंने कुछ नहीं किया बस मैं
कमरे में गया और
चुप-चाप बैठ गया, और घड़ी की आवाज़पर ध्यान
केन्द्रित करने
लगा , कमरे में शांति होने के कारणमुझे
घड़ी की टिक-टिक सुनाई
दे गयी , जिससे मैंने
उसकी दिशा काअंदाजा लगा लिया और
आलमारी के पीछे गिरी ये घड़ी खोज निकाली.”
Friends, जिस तरह कमरे की शांति घड़ी ढूढने में
मददगार साबित
हुई उसी प्रकार मन की शांति हमें life
की ज़रूरी चीजें समझने में
मददगार होती है . हर दिन हमें अपनेलिए
थोडा वक़्त
निकालना चाहिए , जिसमे हम बिलकुल अकेले हों ,
जिसमे हम
शांति से बैठ कर खुद से बात कर सकें और अपने
भीतर
की आवाज़ को सुन सकें , तभी हम life को और
अच्छे ढंग से
जी पायेंगे...
गुरुवार, 27 जून 2013
मंगलवार, 25 जून 2013
"सचमुच, सोने की चिड़िया "था" हमारा देश.....अब नहीं"
***********************************
बदन पर "रौशनी" ओढ़ी है सबने,
अंधेरा "रूह" तक फैला हुआ है...,
सुना है और इक भूखा भिखारी,
खुदा का नाम लेते "मर" गया है।।
***************************************
दोस्तो, केदारनाथ में महामारी का डर, सामूहिक अग्नि संस्कार की तैयारी, लकड़ी घी के इंतजाम के निर्देश, पुजारियों से मदद का आग्रह...................
केदारनाथ लूटपाट, बाबाओं से लाखों बरामद, बैंक से लूटे 83 लाख, 125 रूपये का एक पराठा, 120 रूपये में पीने का पानी.......
हृदय द्रवित करती हैं ऐसी खबरें.........सचमुच, सोने की चिड़िया "था" हमारा देश.....अब नहीं
(संतोष मिश्रा)
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बदन पर "रौशनी" ओढ़ी है सबने,
अंधेरा "रूह" तक फैला हुआ है...,
सुना है और इक भूखा भिखारी,
खुदा का नाम लेते "मर" गया है।।
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दोस्तो, केदारनाथ में महामारी का डर, सामूहिक अग्नि संस्कार की तैयारी, लकड़ी घी के इंतजाम के निर्देश, पुजारियों से मदद का आग्रह...................
केदारनाथ लूटपाट, बाबाओं से लाखों बरामद, बैंक से लूटे 83 लाख, 125 रूपये का एक पराठा, 120 रूपये में पीने का पानी.......
हृदय द्रवित करती हैं ऐसी खबरें.........सचमुच, सोने की चिड़िया "था" हमारा देश.....अब नहीं
(संतोष मिश्रा)
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रविवार, 16 जून 2013
बच्ची का था इलाज महंगा, गरीब माँ-बाप ने जान ले ली
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आज जब लोग फादर्स डे की बधाईयां देते "संडे" इंज्वाय कर रहे हैं.....अगरतला में एक दिहाड़ी मजदूर और उसकी पत्नी ने छः महीने की बच्ची के इलाज का महंगा खर्च न वहन कर पाने की वजह से उसकी हत्या कर शव घर के नजदीक एक नाले में फेंक दिये जाने की घटना ने मेरे जेहन को झिंझोड़ दिया है।
पुलिस ने बीमार बच्ची के पिता लाबा देबनाथ को गिरफ्तार कर लिया जिसने पत्नी के साथ मिल कर अपनी बेटी लीना की हत्या कर उसे घर के नजदीक एक नाले में फेंकने की बात कबूल कर ली।
बच्ची के पिता लाबा ने बताया कि लीना को टिटनस का संक्रमण होने से रक्तस्त्राव हो रहा था। चिकित्सकों ने प्रत्येक दिन 1500 रूपये की दवा और 900 का एक इंजेक्शन लगाए जाने की सलाह दी थी। घर के इकलौते कमाऊ व्यक्ति एवं दिहाड़ी मजदूर लाबा को पांच सदस्यीय परिवार चलाना पड़ता है और बच्ची के इलाज का खर्च जुटाना उसकी चादर से कहीं ज्यादा था, कैसे फैलाता वह पांव। परिवार ने गांव की पंचायत तथा स्थानीय प्रशासन से मदद की गुहार लगाई थी लेकिन कोई "मदद" नहीं मिली..।
मैं सोच रहा घोटालों के इस देश में जहां डा. मनमोहन सिंह ने स्मार्ट कार्ड जैसी कई योजनाएं चलाई हैं, सभी को दो जून की रोटी मिल सके इसके सभी प्रयास किये गये हैं मगर यह भी सच है कि प्रयास जमीनी नहीं "कागजी" ज्यादा हो गये हैं......!
ऐसी हृदय विदारक घटनाएं सचमुच देश के उन सभी जिम्मेदारों को "चुल्लु भर पानी देने" विवश करती हैं जो जिम्मेदारियां लिये हैं और केवल अपने घर भर रहे हैं......, ऐसी घटनाओं के बाद भी कैसे उतरता होगा अन्न इनके गले की हलक से नीचे......? सचमुच शर्म और नैतिकता मेरे देश से उसी तरह खत्म होती जा रही जैसे इसे मिला सोने की चिड़िया का "तमगा"..................(संतोष मिश्रा) - 16 जून 2013
रविवार, 7 अक्टूबर 2012
मन के नैन हजार.......: " स " से सावधान .................अजीब लग रहा हैं ...
मन के नैन हजार.......: " स " से सावधान .................
अजीब लग रहा हैं ...: " स " से सावधान ................. अजीब लग रहा हैं न ?पर ये सच्चाई है महिलाओं के लिये पहला " स " तो " सगाई " से ही शुरू हो जाता है उससे निज...
अजीब लग रहा हैं ...: " स " से सावधान ................. अजीब लग रहा हैं न ?पर ये सच्चाई है महिलाओं के लिये पहला " स " तो " सगाई " से ही शुरू हो जाता है उससे निज...
" स " से सावधान .................
अजीब लग रहा हैं न ?पर ये सच्चाई है महिलाओं के लिये पहला " स " तो " सगाई " से ही शुरू हो जाता है उससे निजात मिलती है तो " सास " सामने आ जाती है जो "साँस " तक लेने नही देती है उनसे बची तो "सार्स " यानि चीनी की बिमारी भी इनकी पक्की सहेली होती है ,श्रंगार प्रेमी होने के कारण " सोने " से भी डर, बच गये तो नये शत्रु यानी " सफर " "सड़क " और यहाँ तक की "सहेलियाँ "भी कम खतरा नही होती ,उनका "सनम " न ले उडें ,पर सबसे बड़ा खतरा तो "सजन " के रूप में आता है फिर" शरारत " " शराब " जिनसे बचने के लिये "सजना " संवरना " पड़ता है एक और खतरा इन्तजार में ही रहता है "सौत " के रूप में ,जिससे "सपने " में भी डर लगता है |ये सभी " स " एक " सदमे " का रूप ले लेते हैं |
तभी तो कहता हूँ महिलाएं पुरुषों से ज्यादा भावुक होती हैं " संकट " में फसे व्यक्तियों को "संकट " से छुटकारे के लिये "समझाने " लगती हैं यही समझाना ही उनके लिये "संकट " बन जाता है "सफाई " भी देनी पडती है सो अलग ,है न "स " खतरनाक क्रपया "स " से दूर ही रहे ,ये भी एक विडम्बना ही ही है मेरा नाम भी तो "स " से ही है .......................
अजीब लग रहा हैं न ?पर ये सच्चाई है महिलाओं के लिये पहला " स " तो " सगाई " से ही शुरू हो जाता है उससे निजात मिलती है तो " सास " सामने आ जाती है जो "साँस " तक लेने नही देती है उनसे बची तो "सार्स " यानि चीनी की बिमारी भी इनकी पक्की सहेली होती है ,श्रंगार प्रेमी होने के कारण " सोने " से भी डर, बच गये तो नये शत्रु यानी " सफर " "सड़क " और यहाँ तक की "सहेलियाँ "भी कम खतरा नही होती ,उनका "सनम " न ले उडें ,पर सबसे बड़ा खतरा तो "सजन " के रूप में आता है फिर" शरारत " " शराब " जिनसे बचने के लिये "सजना " संवरना " पड़ता है एक और खतरा इन्तजार में ही रहता है "सौत " के रूप में ,जिससे "सपने " में भी डर लगता है |ये सभी " स " एक " सदमे " का रूप ले लेते हैं |
तभी तो कहता हूँ महिलाएं पुरुषों से ज्यादा भावुक होती हैं " संकट " में फसे व्यक्तियों को "संकट " से छुटकारे के लिये "समझाने " लगती हैं यही समझाना ही उनके लिये "संकट " बन जाता है "सफाई " भी देनी पडती है सो अलग ,है न "स " खतरनाक क्रपया "स " से दूर ही रहे ,ये भी एक विडम्बना ही ही है मेरा नाम भी तो "स " से ही है .......................
शनिवार, 22 सितंबर 2012
विश्वस्तरीय प्रदर्शन के लिए प्रधानमंत्री ट्राफी पाने
वाला भिलाई इस्पात संयंत्र ईनाम के लायक नहीं.....?
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नई दिल्ली, 23 सितंबर (डाऊन टु अर्थ)। सर्वश्रेष्ठ एकीकृत इस्पात संयंत्र की प्रधा
वाला भिलाई इस्पात संयंत्र ईनाम के लायक नहीं.....?
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नई दिल्ली, 23 सितंबर (डाऊन टु अर्थ)। सर्वश्रेष्ठ एकीकृत इस्पात संयंत्र की प्रधा
नमंत्री ट्राफी से नवाजे गए देश के दो इस्पात संयंत्र, भिलाई इस्पात और जमशेदपुर टाटा इस्पात इसके लायक नहीं। पर्यावरण समेत अनेक मुद्दों पर काम कर रहे देश के एक प्रमुख संगठन ने अपने सर्वे का हवाला देते हुए इस ट्राफी के लिए होने वाली चयन प्रक्रिया में तत्काल सुधार करने की मांग करते हुए कहा है कि इसमें राज्य के प्रदूषण नियंत्रण मंडलों और स्थानीय समुदायों की चिंताओं पर भी ध्यान दिया जाए।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 27 अगस्त को एक चमक-दमकभरे समारोह में छत्तीसगढ़ के भिलाई इस्पात संयंत्र और जमशेदपुर के टाटा इस्पात संयंत्र को सक्षमता, गुणवत्ता और किफायत में अंतरराष्ट्रीय मानदंड पर खरा उतरने के लिए 2009-10 के सर्वश्रेष्ठ एकीकृत इस्पात संयंत्र का पुरस्कार दिया, लेकिन इन दोनों ही इस्पात संयंत्रो का बरसों से पर्यावरण के मामले में खराब प्रदर्शन रहा है। और इससे यह जाहिर होता है कि पुरस्कार देते समय सक्षमता और पर्यावरण के मुद्दे को अनदेख किया गया।
इस्पात मंत्रालय की वेबसाईट पर दी गई जानकारी के मुताबिक इस्पात संयंत्रों के बीच स्पर्धा खड़ी करने के लिए 1992 से शुरू किए गए इस पुरस्कार के लिए 2 करोड़ रुपये की राशि दी जाती है। हर साल एक निर्णायक मंडल विभिन्न मानदंडों ग्राहक संतोष और संयंत्र के दौरे के अनुभवों के आधार पर इन पुरस्कारों का फैसला करता है।
समाचार के मुताबिक निर्णायक मंडल द्वारा किए गए मूल्यांकन में गृह व्यवस्था, पर्यावरण प्रबंधन, वनीकरण, जल संवर्धन , सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्तर हासिल करने के लिए की गई कोशिश जैसे पर्यावरण के मुद्दों पर भी विचार किया था।
अन्य मानदंडों में परिधीय और सहायक विकास, सुरक्षा, स्वास्थ्य , उपकरणों की स्थिति, कार्पोरेट प्रशासन, गुणवत्ता और आर्थिक पक्ष, ग्राहक संतोष के लिए अपनाई जाती प्रक्रिया, लिंगभेद दूर करने के लिए की गई कोशिशें, महिला , विकलांग और समाज के पिछड़ेवर्ग सशक्तिकरण शामिल है।
यह मूल्यांकन सांख्यिकी विशेषज्ञ और ऊर्जा और बिजली क्षेत्र में योजना आयोग के प्रधान सलाहकार प्रोनब सेन ने किया था। निर्णायक मंडल में इस्पात उद्योग और अकादमिक जगत के मान्धाता मौजूद थे जिनमें मारुति उद्योग के पूर्व प्रबंध निदेशक आरएसएसएलएन भास्करुदु, सेल दुर्गापुर के पूर्व प्रबन्ध निदेशक एस के भट्टाचार्य , बंगलौर स्थित ज़ेवियर्स प्रबन्ध और उद्यमिता संस्थान के उप अध्यक्ष जे फिलिप , बैंक यूनियन के पूर्व नेता के एक नाय्र सेल, मित्तल स्टील्स के साथ काम कर चुके के ए पी सिंह, इस्पात मंत्रालय के अफसर, आई आई टी कानपुर के प्रोफेसर सूर्य प्रताप मेहरोत्रा, और प्रधानमंत्री ट्राफी सचिवालय के अफसर शामिल थे।
ऐसे लोगों द्वारा सर्वश्रेष्ठ चुने गए इस्पात संयंत्रों के बारे में सीएसई ग्रीन रेटिंग प्रोजेक्ट के सर्वे ने पाया कि यह संयंत्र पर्यावरण के विभिन्न मानदंडों का गम्भीर उल्ल्ंघन करते हैं। 2007 -10 के बीच भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल ( सीईसीबी) की रिपोर्ट में लगातार ज्यादा प्रदूषण उत्सर्जन की चेतावनी दी गई है। यह चेतावनी लौह अयस्क तैयर करने वाले धातुमल संयंत्रों, बिजली संयंत्रों, कोयले से कोक बनने वाले कोक ओवंस इस्पात बनने वाले स्टील मेल्टिंग शॉप्स , और संयंत्र के अन्य हिस्सों के उत्सर्जन के बारे में दी गई है। मंडल ने प्रदूषण की समस्या पर स्थानीय मीडिया में आई खबरों का भी संज्ञान लिया है।
जीआरपी की रिपोर्ट में कहा गया है कि कम्पनी अब भी बरसों पुरानी जुड़वां चूल्हा तकनीक से इस्पात बनाती है जिससे गंभीर प्रदूषण पैदा होता है। इस प्रक्रिया से इस्पात बनाने में आठ घंटे लगते हंै और गहरी लाल मिट्टी उत्सर्जित होती है जबकि बेसिक आक्सीजन फर्नेस प्रक्रिया की आधुनिक तकनीक में शुद्ध आक्सीजन की आपूर्ति की जाती है और इस्पात बनाने में 50 मिनट का ही समय लगता है।
यही नहीं सर्वे में यह भी पता चला कि भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए सेल के क्षमता उपयोग के दावे भी संदिग्ध हंै। रेटिंग से पता चला कि इतने ही पैमाने पर बेसिक आक्सीजन फर्नेस या लिंज़ डोनावाटिस कंवर्टरों के इस्तेमाल से इस्पात बनने के लिए अलग-अलग इस्पात संयंत्र अलग-अलग सालाना क्षमता बता रहे हैं। मिसालन सेल का भिलाई स्थित संयंत्र 130 टन क्षमता के हीट एल डी कंवर्टरों से स्टील मेल्टिंग शॉप 2 में सलाना 6 लाख मीट्रिक टन की सालाना क्षमता दिखा रहा है, जबकि इस्पात संयंत्र , जे एस डब्लू के विजयनगर संयंत्र में स्टील मेल्टिंग शॉप 1- इकाई इतनी ही, 130 टन हीट एल डी कनवर्टर की सालाना क्षमता 13 लाख 30 हज़ार मीट्रिक टन की सालाना क्षमता बता रहा है।
जाहिर है भिलाई इस्पात ने एल डी कंवर्टरो की अपनी क्षमता बहुत कम कर के बताई, लेकिन संयंत्र हाल के बरसों में स्टील मेल्टिंग़ शॉप की 120 से 130 फीसदी क्षमता का उपयोग करने का दावा करता रहा है। केन्द्रीय इस्पात मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट में यही कहा गया है इतना ही कम नहीं था तो भिलाई इस्पात संयंत्र पुरस्कार शुरू होने के 17 वर्षों में दस बार प्रधानमंत्री ट्राफी जीतकर देश के किसी भी सरकारी या निजी इस्पात संयंत्र से आगे निकलने का दावा करता है।
भिलाई इस्पात संयंत्र के एक साल पहले के लिए ट्राफी पाने वाले जमशेदपुर स्थित टाटा इस्पात संयंत्र को भी झारखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल से, इसकी कोक बैटरीज़ और धातुमल संयंत्रों से निकल रहे भारी प्रदूषण के लिए कारण बताओ नोटिस, और निर्देश कई बार मिल चुके हैं। यही नहीं सुबर्नरेखा और खरखई नदी के किनारे इसके द्वारा फेंका जा रहा इस्पात लावा और ठोस कचरा भी चिंता का विषय बना हुआ है। संयंत्र के आसपास रहते लोगों ने इससे हो रहे प्रदूषण की शिकायत भी की है।
इन दोनों संयंत्रों की जांच करने पर पता लगता है कि पर्यावरण संबंधी इनका प्रदर्शन कहीं से भी विश्वस्तरीय नहीं है।
सीएसई के ग्रीन रेटिंग प्रोजेक्ट के वरिष्ठ प्रोग्राम मैनेजर उमाशंकर एस ने कहा है कि सर्वे से मिली जानकारी के बाद पता चलता है कि सर्वश्रेष्ठ एकीकृत इस्पात संयंत्र के लिए प्रधानमंत्री ट्रॉफी के लिए होने वाली चयन प्रक्रिया की समीक्षा किए जाने की फौरन जरूरत है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में राज्य प्रदूषण मंडलों की चिंताओं, स्थानीय समुदायों की राय, सुरक्षा संबंधी गतिविधियों को ज्यादा अहमियत दी जानी चाहिए।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 27 अगस्त को एक चमक-दमकभरे समारोह में छत्तीसगढ़ के भिलाई इस्पात संयंत्र और जमशेदपुर के टाटा इस्पात संयंत्र को सक्षमता, गुणवत्ता और किफायत में अंतरराष्ट्रीय मानदंड पर खरा उतरने के लिए 2009-10 के सर्वश्रेष्ठ एकीकृत इस्पात संयंत्र का पुरस्कार दिया, लेकिन इन दोनों ही इस्पात संयंत्रो का बरसों से पर्यावरण के मामले में खराब प्रदर्शन रहा है। और इससे यह जाहिर होता है कि पुरस्कार देते समय सक्षमता और पर्यावरण के मुद्दे को अनदेख किया गया।
इस्पात मंत्रालय की वेबसाईट पर दी गई जानकारी के मुताबिक इस्पात संयंत्रों के बीच स्पर्धा खड़ी करने के लिए 1992 से शुरू किए गए इस पुरस्कार के लिए 2 करोड़ रुपये की राशि दी जाती है। हर साल एक निर्णायक मंडल विभिन्न मानदंडों ग्राहक संतोष और संयंत्र के दौरे के अनुभवों के आधार पर इन पुरस्कारों का फैसला करता है।
समाचार के मुताबिक निर्णायक मंडल द्वारा किए गए मूल्यांकन में गृह व्यवस्था, पर्यावरण प्रबंधन, वनीकरण, जल संवर्धन , सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्तर हासिल करने के लिए की गई कोशिश जैसे पर्यावरण के मुद्दों पर भी विचार किया था।
अन्य मानदंडों में परिधीय और सहायक विकास, सुरक्षा, स्वास्थ्य , उपकरणों की स्थिति, कार्पोरेट प्रशासन, गुणवत्ता और आर्थिक पक्ष, ग्राहक संतोष के लिए अपनाई जाती प्रक्रिया, लिंगभेद दूर करने के लिए की गई कोशिशें, महिला , विकलांग और समाज के पिछड़ेवर्ग सशक्तिकरण शामिल है।
यह मूल्यांकन सांख्यिकी विशेषज्ञ और ऊर्जा और बिजली क्षेत्र में योजना आयोग के प्रधान सलाहकार प्रोनब सेन ने किया था। निर्णायक मंडल में इस्पात उद्योग और अकादमिक जगत के मान्धाता मौजूद थे जिनमें मारुति उद्योग के पूर्व प्रबंध निदेशक आरएसएसएलएन भास्करुदु, सेल दुर्गापुर के पूर्व प्रबन्ध निदेशक एस के भट्टाचार्य , बंगलौर स्थित ज़ेवियर्स प्रबन्ध और उद्यमिता संस्थान के उप अध्यक्ष जे फिलिप , बैंक यूनियन के पूर्व नेता के एक नाय्र सेल, मित्तल स्टील्स के साथ काम कर चुके के ए पी सिंह, इस्पात मंत्रालय के अफसर, आई आई टी कानपुर के प्रोफेसर सूर्य प्रताप मेहरोत्रा, और प्रधानमंत्री ट्राफी सचिवालय के अफसर शामिल थे।
ऐसे लोगों द्वारा सर्वश्रेष्ठ चुने गए इस्पात संयंत्रों के बारे में सीएसई ग्रीन रेटिंग प्रोजेक्ट के सर्वे ने पाया कि यह संयंत्र पर्यावरण के विभिन्न मानदंडों का गम्भीर उल्ल्ंघन करते हैं। 2007 -10 के बीच भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल ( सीईसीबी) की रिपोर्ट में लगातार ज्यादा प्रदूषण उत्सर्जन की चेतावनी दी गई है। यह चेतावनी लौह अयस्क तैयर करने वाले धातुमल संयंत्रों, बिजली संयंत्रों, कोयले से कोक बनने वाले कोक ओवंस इस्पात बनने वाले स्टील मेल्टिंग शॉप्स , और संयंत्र के अन्य हिस्सों के उत्सर्जन के बारे में दी गई है। मंडल ने प्रदूषण की समस्या पर स्थानीय मीडिया में आई खबरों का भी संज्ञान लिया है।
जीआरपी की रिपोर्ट में कहा गया है कि कम्पनी अब भी बरसों पुरानी जुड़वां चूल्हा तकनीक से इस्पात बनाती है जिससे गंभीर प्रदूषण पैदा होता है। इस प्रक्रिया से इस्पात बनाने में आठ घंटे लगते हंै और गहरी लाल मिट्टी उत्सर्जित होती है जबकि बेसिक आक्सीजन फर्नेस प्रक्रिया की आधुनिक तकनीक में शुद्ध आक्सीजन की आपूर्ति की जाती है और इस्पात बनाने में 50 मिनट का ही समय लगता है।
यही नहीं सर्वे में यह भी पता चला कि भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए सेल के क्षमता उपयोग के दावे भी संदिग्ध हंै। रेटिंग से पता चला कि इतने ही पैमाने पर बेसिक आक्सीजन फर्नेस या लिंज़ डोनावाटिस कंवर्टरों के इस्तेमाल से इस्पात बनने के लिए अलग-अलग इस्पात संयंत्र अलग-अलग सालाना क्षमता बता रहे हैं। मिसालन सेल का भिलाई स्थित संयंत्र 130 टन क्षमता के हीट एल डी कंवर्टरों से स्टील मेल्टिंग शॉप 2 में सलाना 6 लाख मीट्रिक टन की सालाना क्षमता दिखा रहा है, जबकि इस्पात संयंत्र , जे एस डब्लू के विजयनगर संयंत्र में स्टील मेल्टिंग शॉप 1- इकाई इतनी ही, 130 टन हीट एल डी कनवर्टर की सालाना क्षमता 13 लाख 30 हज़ार मीट्रिक टन की सालाना क्षमता बता रहा है।
जाहिर है भिलाई इस्पात ने एल डी कंवर्टरो की अपनी क्षमता बहुत कम कर के बताई, लेकिन संयंत्र हाल के बरसों में स्टील मेल्टिंग़ शॉप की 120 से 130 फीसदी क्षमता का उपयोग करने का दावा करता रहा है। केन्द्रीय इस्पात मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट में यही कहा गया है इतना ही कम नहीं था तो भिलाई इस्पात संयंत्र पुरस्कार शुरू होने के 17 वर्षों में दस बार प्रधानमंत्री ट्राफी जीतकर देश के किसी भी सरकारी या निजी इस्पात संयंत्र से आगे निकलने का दावा करता है।
भिलाई इस्पात संयंत्र के एक साल पहले के लिए ट्राफी पाने वाले जमशेदपुर स्थित टाटा इस्पात संयंत्र को भी झारखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल से, इसकी कोक बैटरीज़ और धातुमल संयंत्रों से निकल रहे भारी प्रदूषण के लिए कारण बताओ नोटिस, और निर्देश कई बार मिल चुके हैं। यही नहीं सुबर्नरेखा और खरखई नदी के किनारे इसके द्वारा फेंका जा रहा इस्पात लावा और ठोस कचरा भी चिंता का विषय बना हुआ है। संयंत्र के आसपास रहते लोगों ने इससे हो रहे प्रदूषण की शिकायत भी की है।
इन दोनों संयंत्रों की जांच करने पर पता लगता है कि पर्यावरण संबंधी इनका प्रदर्शन कहीं से भी विश्वस्तरीय नहीं है।
सीएसई के ग्रीन रेटिंग प्रोजेक्ट के वरिष्ठ प्रोग्राम मैनेजर उमाशंकर एस ने कहा है कि सर्वे से मिली जानकारी के बाद पता चलता है कि सर्वश्रेष्ठ एकीकृत इस्पात संयंत्र के लिए प्रधानमंत्री ट्रॉफी के लिए होने वाली चयन प्रक्रिया की समीक्षा किए जाने की फौरन जरूरत है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में राज्य प्रदूषण मंडलों की चिंताओं, स्थानीय समुदायों की राय, सुरक्षा संबंधी गतिविधियों को ज्यादा अहमियत दी जानी चाहिए।
रविवार, 16 सितंबर 2012
मन के नैन हजार.......: "मैं ऐसी कविता लिखना चाहता हूं, जो मुझसे बात करे...
मन के नैन हजार.......:
"मैं ऐसी कविता लिखना चाहता हूं, जो मुझसे बात करे...: "मैं ऐसी कविता लिखना चाहता हूं, जो मुझसे बात करे। जो एक व्यक्ति के मन से बात करे, उसका मर्म समझे। और एक व्यक्ति क्या, जो समूची आवाम का द...
"मैं ऐसी कविता लिखना चाहता हूं, जो मुझसे बात करे...: "मैं ऐसी कविता लिखना चाहता हूं, जो मुझसे बात करे। जो एक व्यक्ति के मन से बात करे, उसका मर्म समझे। और एक व्यक्ति क्या, जो समूची आवाम का द...
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