रविवार, 30 अक्टूबर 2011

SANTOSH MISHRA...: मेरी डाय़री के पन्ने में सिमटती......"डायन"

SANTOSH MISHRA...: मेरी डाय़री के पन्ने में सिमटती......"डायन": मेरी डाय़री के पन्ने में सिमटती......"डायन" ****************************** *************************** डायन वाली "खबर" आग की तरह पूरे देश...

SANTOSH MISHRA...: बदलने की प्रक्रिया

SANTOSH MISHRA...: बदलने की प्रक्रिया: समय की तकली में रूई की तरह कत रहा है "वर्तमान" और उसी तकली की बेंत पर सूत सा लिपट रहा है "भूत"। सूत के आदिम छोर को पकड़ धीरे-धीरे "वर्तमान...

बदलने की प्रक्रिया


समय की तकली में रूई की तरह कत रहा है "वर्तमान" और उसी तकली की बेंत पर सूत सा लिपट रहा है "भूत"।
सूत के आदिम छोर को पकड़ धीरे-धीरे "वर्तमान" तक जाओगे तो पता चलेंगी तुम्हें "विकास व सभ्यता" की तमाम गाथाएं।
तुम जानने लगोगे कि "पशु" से "मनुष्य" में बदलने की प्रक्रिया कितनी धीमी थी और यहभी समझ लोगे कि आज कितनी जल्दी बदल जाते हैं लोग "मनुष्य" से "पशु" में...............(संतोष मिश्रा)

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

मेरी डाय़री के पन्ने में सिमटती......"डायन"

मेरी डाय़री के पन्ने में सिमटती......"डायन"
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डायन वाली "खबर" आग की तरह पूरे देश में फैल गई, लोग कसमें खा कर कहते उन्होंने "डायन" को देखा है, उसके रोने-चीखने की आवाज सुनी है.......।


लोग मुझसे भी बता रहे थे.. ..."खिड़की की सलाखों से पंजे बढ़ाती है डायन भूख..! भूख...! चिल्लाती है....! खाना मांगती है....।"
मेरे साथ कई लोग विस्मय से आंखें फैला कर डायन का किस्सा सुनते।

"आश्चर्य....ऐसी घनी आबादी वाले इलाके में शहर के बीचो बीच डायन का होना क्या कोई मामूली बात थी। पहले तो सब ठीक था, अचानक यह घर भूत बंगला कैसे बन गया....ये सोच रहा था मैं भी।"

जितनी मुंह उतनी बातें। ऐसी हलचल मची कि मीडिया वालों की लाईन लग गई।
सबसे लोकप्रिय चैनल वालों ने डायन का लाइव टेलीकास्ट शुरू कर दिया।
लाखों दर्शक सांस रोक देख रहे थे।

घने अंधेरे को चीरते हुए कैमरा आगे बढ़ रहा था।
रिपोर्टर गहरी रहस्यमय आवाज में कह रहा था-क्या आज खत्म हो जायेगा डायन का खूनी खेल......
चर्रर्र..... की आवाज के साथ दरवाजा खुला।
भीतर से सिसकी की आवाज आ रही थी। लोगों के रोंगटे खड़े हो गए। सचमुच एक परछाई जो दिखी थी। अब की तस्वीर साफ थी। सचमुच डायन ही थी। बूढ़ा जर्जर शरीर, वीरान सी आंखें..., कमर पर झूलते चीथड़े गंदगी में लिपटा हुआ बदन..।

उसके खरखराते हुए गले से चीख निकली, लोग सहमे....। अब झपटी डायन खून पी लेगी रिपोर्टर का। पर डायन तो कांपती हुई उसके पैरों पर गिर कर रो पड़ी।
वो कह रही थी - "बेटा, बहू से कहना मैं कुछ नहीं बोलूंगी, कुत्ते की तरह तेरे दरवाजे पर पड़ी रहूंगी। कितने दिनों से तेरी राह देख रही हूं। जो खाना तू दे कर गया था, कब का खत्म हो गया। मुझे अपने साथ ही ले चल। जो रूखा-सूखा देगा....वहीं खा कर रह लूंगी। मुझे यहां अकेला मत छोड़, मेरे बेटे। अपनी माँ पर दया कर, मेरे लाल..।"
मैं सोच रहा था, कितना दुःख भरा है इस डायन में....किसने भरा, क्यों भरा...मैं अभी भी सोच रहा हूं......(संतोष मिश्रा)
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सोमवार, 8 अगस्त 2011

"आंखें" बंद किये देख रहा हूं, चापलूसों को.......

मैं देख रहा हूं.....
"भाव" के "अभाव" में हौले से जन्मता है "दुर्भाव",
"दुर्भावना" के दबाव में सिसक रही है "भावना",
और आप कहते हैं कि....
"भावना" को समझिये "शब्दों" में क्या रखा है....!
हां, गलत कहते हैं आप,
सब "शब्दों" का ही "खेल" है,
शब्दों ने ही "अलग" किया,
और अब तो जनाब "शब्दों" में ही "मेल" है,
"भावना", "संवेदना" सब "खत्म" हो रही हैं
और मैं सिर्फ और सिर्फ "आंखें" बंद किये देख रहा हूं, चापलूसों को.......
और मैं सिर्फ और सिर्फ "आंखें" बंद किये देख रहा हूं, चापलूसों को.......





शनिवार, 6 अगस्त 2011

बड़े आदमी की माँ

बड़े आदमी की माँ



तेज चिलचिलाती धूप में एक माँ अपने बेटे का बैग थामे उसे स्कूल से लेकर चली आ रही है। मन में बड़े–बड़े अरमान लिए कि,‘मेरा बेटा एक दिन ‘बड़ा आदमी’ बनेगा।’ हाथ की छतरी ऐसे पकड़े है कि खुद की कुछ परवाह नहीं है किंतु बेटे पर धूप का एक कतरा भी न पड़ने देती है।तीस साल बीत चुके हैं, आज उसका बेटा ‘बड़ा अधिकारी बन चुका है, सारे शानो–शौकत का मालिक है परंतु वह माँ आज भी चिलचिलाती धूप में स्कूल का बैग थामे अपने पोते को साथ लिए चली जा रही है, छाता भी वैसे ही पकड़े है कि पोते पर धूप का एक कतरा भी न पड़े, यकीनन यह पोता भी ‘बड़ा अधिकारी’ बनेगा....।

नासमझ

नासमझ


नन्ही पिंकी आज बहुत खुश थी। जिन गन्दी गरीब लड़कियों के साथ उसे खेलने की इजाजत नहीं थी, आज उन्हें ही बंगले में बुलाया गया था। वो भी दादी माँ के आदेश पर।

आज दुर्गाष्टमी जो थी। दादी माँ ने अपने हाथों से उन सभी के ललाट पर रोली का टीका लगाया। उनके हाथों में मौली का धागा बाँधकर उनका पूजन किया फिर उन सभी के आगे बड़े–बड़े थाल भरकर खरी–पूड़ी, हलवा व चने का शाक परोसा।

इस पर माँ ने हल्का-सा विरोध किया था, ‘‘ माँ जी इतनी छोटी बच्चियाँ इतना ज्यादा खाना नहीं खा पाएंगी।’’
दादी भड़क उठी थीं, ‘‘ये कैसी ओछी बात कर दी बहू तुमने। देवी के के शाप से डरो। ये कन्याएँ देवी का ही रूप् हैं।’’ माँ ने फौरन चुप्पी साध ली थी।
शरमाती–सकुचाती, सहमी हुई बच्चियों ने आधे से ज्यादा खाना झूठा छोड़ दिया था। दादी ने उन गरीब बच्चियों के हाथ में दस–दस रुपए के करारे नोट पकड़ाए।
उनके जाने के बाद दादी के कहने पर नौकर रामू ने उनकी थालियों की जूठन चार प्लास्टिक की थैलियों में भरकर दरवाजे पर रख दी। ये सब देख पिंकी पूछ बैठी।

‘‘दादी जूठे खाने को रामू ने थैलियों में डालकर क्यों रखा है?’’

दादी ने समझाया, ‘‘आज दुर्गाष्टमी है ना। जमादारिन खाना माँगने आती ही होगी उसे देने के लिए ही रखा है।’’
पिंकी किंचित हैरानी से बोली, ‘‘दादी ये तो जूठा खाना है। आप तो कहती हो कि किसी दूसरे का जूठा खाना नहीं खाना चाहिए। बहुत सी बीमारियाँ लग जाती हैं और पाप भी लगता है?’’

दादी मुस्करायी, ‘‘अरे बिट्टो आज के दिन कन्याओं का ये जूठन,देवी का प्रसाद होता है, इसे खाकर तो जमादारिन की सभी बीमारियाँ ठीक हो जाएगी साथ ही उसके कई जन्मों के पाप भी धुल जाएंगे।
जमादारिन की रोटी माँगने की आवाज सुनकर रामू खाने की थैलियाँ लेने अन्दर आया किन्तु कमरे का दृश्य देखकर स्तब्ध रह गया। पिंकी थैलियों में रखी जूठन निकालकर अपनी खाने की थाली में डाल रही थी। तभी दादी माँ भी जमादारिन को पैसे देने उधर आ पहुँची।
‘‘पिंकी ये क्या गजब कर रही है?’’
दादी माँ की दहाड़ सुनकर सहमी पिंकी धीरे से बोली, ‘‘दादी थोड़ा सा देवी का प्रसाद ले रही थी। इसके खाने से मेरे टांसिल भी हमेशा-हमेशा के लिए ठीक हो जाएंगे।’’
दादी भड़क उठी, ‘‘बेवकूफ लड़की ये खाना तेरे लिए जहर है। ना जाने कितनी बीमारियाँ समेटे गन्दे, गरीब व छोटी जात की लड़कियों की जूठन है ये। मूर्खा दुनिया भर के पाप अपने सिर पर लगाना चाहती है?’’
पिंकी हैरान थी, ‘‘पर दादी आपने ही तो कहा था कि ये देवी माँ का प्रसाद है। इसके खाने से जमादारिन की सभी बीमारियाँ ठीक हो जाएगी तो फिर मेरे टांसिल....दादी आग बबूला हो उसी बात काटती हुई चिल्लाई, ‘‘चुप कर, बित्ते भर की छोकरी होकर मुझसे बहस करती है। आज तक तेरी माँ की हिम्मत नहीं हुई, मुझसे इस तरह के सवाल–जवाब करने की।’’
नन्हीं पिंकी सहमकर चुप हो गई लेकिन अब भी उसकी समझ में ये नहीं आ रहा था कि जूठा खाना जमादारिन के लिए देवी का प्रसाद है वो उसके लिए जहर कैसे हो सकता है?