रविवार, 25 फ़रवरी 2018

दो माले का मकान और जबरदस्त #टशन

#भिखारियों के कौशल के सामने केंद्र सरकार की योजना "बौनी"
00 दो माले का मकान और जबरदस्त #टशन
00 राजनीति ही नहीं यहाँ भी #परिवारवाद हावी
#भिलाईनगर। (छत्तीसगढ़) #सन्तोषमिश्रा 24/02/2018
#भिखारी शब्द सुनते ही आप के जेहन में फटे पुराने कपड़े, बिखरे बाल वाले शख्स की तस्वीर आती होगी, लेकिन हो सकता है कि ये खबर पढ़ के आप के होश ही उड़ जाएं।क्या अपने सोचा है कि किसी भिखारी के पास दो मंजिला मकान हो सकता है? छत्तीसगढ़ की इस्पात नगरी भिलाई में यूँ तो हर चौक चौराहों, बड़े रेस्टॉरेंट के अलावा हर मंदिर और मन्नत की जगहों पर भिखारियों को देखा जा सकता है लेकिन सेक्टर 9 हनुमान मंदिर के बाहर बैठे दीन हींन भिखारियों का जबरदस्त टशन है, मजाल है कि कोई इनसे बदतमीजी कर ले। कुछ तो इतने दबंग हैं कि भिलाई इस्पात संयंत्र (बीएसपी) के क्वार्टरों पर भी कब्जा जमा रखा है। और तो और जनाब आपकी दया और करुणा के पात्र यहां के कई भिखारी हर रोज 500 रुपए तमाम खर्च के बाद बाकायदा बचत भी करते हैं।
बीएसपी हॉस्पिटल परिसर स्थित हनुमान मंदिर, सेक्टर-6 साईं मंदिर, पावर हाउस अंडर ब्रिज के नीचे बना शनि मंदिर इस लिहाज से ज्यादा कमाई वाले स्थान माने जाते हैं। यहां बैठने वाले भिखारी काफी मालदार हैं। इस सब के अलावा बाकायदा सप्ताह में तीन दिन भिखारियों की पूरी टीम 10-10 की टोली बना शहर के बाजार और मार्किट एरिया में भिक्षा याचना के साथ निकलती है। परिवारवाद केवल राजनीति ही नहीं इस कारोबार में लगे लोगों पर भी पूरी तरह हावी है, किसी नए भिखारी के लिए यहां जगह बनाना आसान नहीं।
हालांकि केंद्र सरकार ने हाल फिलहाल भिखारियों को #कौशल विकास योजना के तहत प्रशिक्षित कर रोजगार-स्वरोजगार मुहैया कराने का फैसला किया है लेकिन भिलाई के इन भिखारियों का खासा बैंक बैलेंस, स्टेटस, शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार में इनकी शान शौकत का कौशल गर आप देख लें तो यकीनन दाँतों तले उंगली दबा सोचने मजबूर हो जाएंगे। जी हां, यहां के कई भिखारी दो मंजिला मकानों के मालिक हैं। दरअसल ये पेशेवर भिखारी हैं। जो भिखारी का वेश धारण कर जमकर भीख बटोरते हैं। रोजाना 500 रुपए की कमाई बड़ी सामान्य बात है, औसतन 1200 से 1500 रुपए व मंगलवार व शनिवार को ढाई से तीन हजार रुपए तक कमाने वाले भिखारी यहां मिलेंगे।
ये भिखारी राशन कार्ड, स्मार्ट कार्ड, आधार कार्ड यहां तक कि पैन कार्ड के भी धारक हैं। इनकी यूनियन भी है, जिसके बाकायदा मनोनीत पदाधिकारी हैं। कोई चुनाव तो नहीं होता मगर सर्वसम्मति जरूर आंकी जाती है। कोई घटना होने पर मोबाइल फोन से सभी एक दूसरे से संपर्क करते हैं और देखते ही देखते तमाम भिखारी एक स्थान पर जुट जाते हैं।
भिलाई के भिखारियों के कौशल की यह पूरी तफ्तीश अकेले मैने ही नहीं बल्कि कइयों ने की है और करते भी रहेंगे, खुद भिलाई स्टील प्लांट ने पिछले दिनों अपने सीमा क्षेत्र में भीख मांगने वालों की जांच-पड़ताल कर जानकारी जुटाई है। बीएसपी के जन स्वास्थ्य अधिकारी सीनियर मैनेजर केके यादव ने बताया कि इस सर्वे में यह सारी बातें निकल कर आई हैं। बीएसपी ने माना है कि इनमें से कुछ भिखारियों ने सेक्टर-7 में कुछ क्वार्टरों पर कब्जा भी किया हुआ है। कुछ भिखारी अपनी पोल छिपाते हुए दबी जुबान पड़ोसी की पोल आसानी से खोलते हैं, ये बताते हैं कि सबके घर सबकुछ है, मगर ये भी तो एक तरह से काम धंधा ही है, काफी दूर पैदल चल के ठिकाने तक पहुँचना, घूम घूम कर हाथ फैलाना, मना करने पर भी खड़े रहना कि शायद कुछ मिल जाये। कई भिखारी बाकायदा चिल्हर पैसे को दे कर बड़े नोट बड़े व्यवसाइयों से हर रोज बदलते है जो कि 500 से 1500 तक होता है। सचमुच भिलाई के भिखारियों के कौशल के सामने केंद्र सरकार की कौशल विकास योजना बौनी ही लगती है।

शनिवार, 20 मई 2017

क्षा शुरू करने से पहले हमेशा "आई लव यू ऑल" बोला करतीं

एक छोटे से शहर के प्राथमिक स्कूल में कक्षा 5 की शिक्षिका थीं।
उनकी एक आदत थी कि वह कक्षा शुरू करने से पहले हमेशा "आई लव यू ऑल" बोला करतीं। मगर वह जानती थीं कि वह सच नहीं कहती । वह कक्षा के सभी बच्चों से उतना प्यार नहीं करती थीं।
कक्षा में एक ऐसा बच्चा था जो उनको एक आंख नहीं भाता। उसका नाम राजू था। राजू मैली कुचेली स्थिति में स्कूल आजाया करता है। उसके बाल खराब होते, जूतों के बन्ध खुले, शर्ट के कॉलर पर मेल के निशान। । । व्याख्यान के दौरान भी उसका ध्यान कहीं और होता।
मिस के डाँटने पर वह चौंक कर उन्हें देखता तो लग जाता..मगर उसकी खाली खाली नज़रों से उन्हें साफ पता लगता रहता.कि राजू शारीरिक रूप से कक्षा में उपस्थित होने के बावजूद भी मानसिक रूप से गायब हे.धीरे धीरे मिस को राजू से नफरत सी होने लगी। क्लास में घुसते ही राजू मिस की आलोचना का निशाना बनने लगता। सब बुराई उदाहरण राजू के नाम पर किये जाते. बच्चे उस पर खिलखिला कर हंसते.और मिस उसको अपमानित कर के संतोष प्राप्त करतीं। राजू ने हालांकि किसी बात का कभी कोई जवाब नहीं दिया था।
मिस को वह एक बेजान पत्थर की तरह लगता जिसके अंदर महसूस नाम की कोई चीज नहीं थी। प्रत्येक डांट, व्यंग्य और सजा के जवाब में वह बस अपनी भावनाओं से खाली नज़रों से उन्हें देखा करता और सिर झुका लेता । मिस को अब इससे गंभीर चिढ़ हो चुकी थी। 
पहला सेमेस्टर समाप्त हो गया और रिपोर्ट बनाने का चरण आया तो मिस ने राजू की प्रगति रिपोर्ट में यह सब बुरी बातें लिख मारी । प्रगति रिपोर्ट माता पिता को दिखाने से पहले हेड मिसट्रेस के पास जाया करती थी। उन्होंने जब राजू की रिपोर्ट देखी तो मिस को बुला लिया। "मिस प्रगति रिपोर्ट में कुछ तो प्रगति भी लिखनी चाहिए। आपने तो जो कुछ लिखा है इससे राजू के पिता इससे बिल्कुल निराश हो जाएंगे।" "मैं माफी माँगती हूँ, लेकिन राजू एक बिल्कुल ही अशिष्ट और निकम्मा बच्चा है । मुझे नहीं लगता कि मैं उसकी प्रगति के बारे में कुछ लिख सकती हूँ। "मिस घृणित लहजे में बोलकर वहां से उठ आईं।
हेड मिसट्रेस ने एक अजीब हरकत की। उन्होंने चपरासी के हाथ मिस की डेस्क पर राजू की पिछले वर्षों की प्रगति रिपोर्ट रखवा दी । अगले दिन मिस ने कक्षा में प्रवेश किया तो रिपोर्ट पर नजर पड़ी। पलट कर देखा तो पता लगा कि यह राजू की रिपोर्ट हैं। "पिछली कक्षाओं में भी उसने निश्चय ही यही गुल खिलाए होंगे।" उन्होंने सोचा और कक्षा 3 की रिपोर्ट खोली। रिपोर्ट में टिप्पणी पढ़कर उनकी आश्चर्य की कोई सीमा न रही जब उन्होंने देखा कि रिपोर्ट उसकी तारीफों से भरी पड़ी है। "राजू जैसा बुद्धिमान बच्चा मैंने आज तक नहीं देखा।" "बेहद संवेदनशील बच्चा है और अपने मित्रों और शिक्षक से बेहद लगाव रखता है।" "
अंतिम सेमेस्टर में भी राजू ने प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है। "मिस ने अनिश्चित स्थिति में कक्षा 4 की रिपोर्ट खोली।" राजू ने अपनी मां की बीमारी का बेहद प्रभाव लिया। .उसका ध्यान पढ़ाई से हट रहा है। "" राजू की माँ को अंतिम चरण का कैंसर हुआ है। । घर पर उसका और कोई ध्यान रखनेवाला नहीं है.जिसका गहरा प्रभाव उसकी पढ़ाई पर पड़ा है। ""
राजू की माँ मर चुकी है और इसके साथ ही राजू के जीवन की चमक और रौनक भी। । उसे बचाना होगा...इससे पहले कि बहुत देर हो जाए। "मिस के दिमाग पर भयानक बोझ हावी हो गया। कांपते हाथों से उन्होंने प्रगति रिपोर्ट बंद की । आंसू उनकी आँखों से एक के बाद एक गिरने लगे.
अगले दिन जब मिस कक्षा में दाख़िल हुईं तो उन्होंने अपनी आदत के अनुसार अपना पारंपरिक वाक्यांश "आई लव यू ऑल" दोहराया। मगर वह जानती थीं कि वह आज भी झूठ बोल रही हैं। क्योंकि इसी क्लास में बैठे एक उलझे बालों वाले बच्चे राजू के लिए जो प्यार वह आज अपने दिल में महसूस कर रही थीं..वह कक्षा में बैठे और किसी भी बच्चे से हो ही नहीं सकता था । व्याख्यान के दौरान उन्होंने रोजाना दिनचर्या की तरह एक सवाल राजू पर दागा और हमेशा की तरह राजू ने सिर झुका लिया। जब कुछ देर तक मिस से कोई डांट फटकार और सहपाठी सहयोगियों से हंसी की आवाज उसके कानों में न पड़ी तो उसने अचंभे में सिर उठाकर उनकी ओर देखा। अप्रत्याशित उनके माथे पर आज बल न थे, वह मुस्कुरा रही थीं। उन्होंने राजू को अपने पास बुलाया और उसे सवाल का जवाब बताकर जबरन दोहराने के लिए कहा। राजू तीन चार बार के आग्रह के बाद अंतत:बोल ही पड़ा। इसके जवाब देते ही मिस ने न सिर्फ खुद खुशान्दाज़ होकर तालियाँ बजाईं बल्कि सभी से भी बजवायी.. फिर तो यह दिनचर्या बन गयी। मिस हर सवाल का जवाब अपने आप बताती और फिर उसकी खूब सराहना तारीफ करतीं। प्रत्येक अच्छा उदाहरण राजू के कारण दिया जाने लगा । धीरे-धीरे पुराना राजू सन्नाटे की कब्र फाड़ कर बाहर आ गया। अब मिस को सवाल के साथ जवाब बताने की जरूरत नहीं पड़ती। वह रोज बिना त्रुटि उत्तर देकर सभी को प्रभावित करता और नये नए सवाल पूछ कर सबको हैरान भी। 
उसके बाल अब कुछ हद तक सुधरे हुए होते, कपड़े भी काफी हद तक साफ होते जिन्हें शायद वह खुद धोने लगा था। देखते ही देखते साल समाप्त हो गया और राजू ने दूसरा स्थान हासिल कर लिया यानी दूसरी क्लास । 
विदाई समारोह में सभी बच्चे मिस के लिये सुंदर उपहार लेकर आए और मिस की टेबल पर ढेर लग गये । इन खूबसूरती से पैक हुए उपहार में एक पुराने अखबार में बद सलीके से पैक हुआ एक उपहार भी पड़ा था। बच्चे उसे देखकर हंस पड़े। किसी को जानने में देर न लगी कि उपहार के नाम पर ये राजू लाया होगा। मिस ने उपहार के इस छोटे से पहाड़ में से लपक कर उसे निकाला। खोलकर देखा तो उसके अंदर एक महिलाओं की इत्र की आधी इस्तेमाल की हुई शीशी और एक हाथ में पहनने वाला एक बड़ा सा कड़ा था जिसके ज्यादातर मोती झड़ चुके थे। मिस ने चुपचाप इस इत्र को खुद पर छिड़का और हाथ में कंगन पहन लिया। बच्चे यह दृश्य देखकर हैरान रह गए। खुद राजू भी। आखिर राजू से रहा न गया और मिस के पास आकर खड़ा हो गया। । 
कुछ देर बाद उसने अटक अटक कर मिस को बताया कि "आज आप में से मेरी माँ जैसी खुशबू आ रही है।"
समय पर लगाकर उड़ने लगा। दिन सप्ताह, सप्ताह महीने और महीने साल में बदलते भला कहां देर लगती है? मगर हर साल के अंत में मिस को राजू से एक पत्र नियमित रूप से प्राप्त होता जिसमें लिखा होता कि "इस साल कई नए टीचर्स से मिला।। मगर आप जैसा कोई नहीं था।" फिर राजू का स्कूल समाप्त हो गया और पत्रों का सिलसिला भी। कई साल आगे गुज़रे और मिस रिटायर हो गईं। एक दिन उन्हें अपनी मेल में राजू का पत्र मिला जिसमें लिखा था:
"इस महीने के अंत में मेरी शादी है और आपके बिना शादी की बात मैं नहीं सोच सकता। एक और बात .. मैं जीवन में बहुत सारे लोगों से मिल चुका हूं।। आप जैसा कोई नहीं है.........डॉक्टर राजू
साथ ही विमान का आने जाने का टिकट भी लिफाफे में मौजूद था। मिस खुद को हरगिज़ न रोक सकती थीं। उन्होंने अपने पति से अनुमति ली और वह दूसरे शहर के लिए रवाना हो गईं। शादी के दिन जब वह शादी की जगह पहुंची तो थोड़ी लेट हो चुकी थीं। उन्हें लगा समारोह समाप्त हो चुका होगा.. मगर यह देखकर उनके आश्चर्य की सीमा न रही कि शहर के बड़े डॉ, बिजनेसमैन और यहां तक कि वहां पर शादी कराने वाले पंडितजी भी थक गये थे. कि आखिर कौन आना बाकी है...मगर राजू समारोह में शादी के मंडप के बजाय गेट की तरफ टकटकी लगाए उनके आने का इंतजार कर रहा था। फिर सबने देखा कि जैसे ही यह पुरानी शिक्षिका ने गेट से प्रवेश किया राजू उनकी ओर लपका और उनका वह हाथ पकड़ा जिसमें उन्होंने अब तक वह सड़ा हुआ सा कंगन पहना हुआ था और उन्हें सीधा मंच पर ले गया। माइक हाथ में पकड़ कर उसने कुछ यूं बोला "दोस्तों आप सभी हमेशा मुझसे मेरी माँ के बारे में पूछा करते थे और मैं आप सबसे वादा किया करता था कि जल्द ही आप सबको उनसे मिलाउंगा।।।........यह मेरी माँ हैं - ------------------------- "
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!! प्रिय दोस्तों.... इस सुंदर कहानी को सिर्फ शिक्षक और शिष्य के रिश्ते के कारण ही मत सोचिएगा । अपने आसपास देखें, राजू जैसे कई फूल मुरझा रहे हैं जिन्हें आप का जरा सा ध्यान, प्यार और स्नेह नया जीवन दे सकता है...........

सोमवार, 5 सितंबर 2016

अंकित का डेढ़ घंटे से बंद "दिल" बाद अचानक धड़कने लगा

00 सात मिनट करेंट के प्रवाह ने ले ही ली थी जान
00 मेडिकल जर्नल्स के लिए नई थीम, भिलाई में मिरेकल
-- SANTOSH MISHRA --  
भिलाई। 29 AUG 2016 सोमवार की रात विद्युत करंट की चपेट में आये 14 वर्षीय अंकित का डेढ़ घंटे बाद सीपीआर की वजह से बंद दिल पुन: धड़कने लगा। परिजन रोते हुए पूरी तरह हार चुके थे लेकिन बीएम शाह हास्पिटल की चिकित्सकीय टीम ने हार नहीं मानी और पैरेंट्स को सांत्वना देते उन्होंने ऐसा करिश्मा कर दिखाया जो कि चिकित्सा जगत में एक अनूठी मिशाल साबित होगा। 48 घंटे के कठिन चिकित्सकीय दौर को पार कर अब अंकित पूरी तरह स्वस्थ है। आरबीआई नागपुर में सुरक्षा गार्ड बृजेश राय व उनका पूरा परिवार अंकित के पुनर्जन्म से बेहद खुश है और परिवार सहित पूरा मोहल्ला इस चिकित्सकीय टीम का आभार जताने जुटा हुआ है।
मिली जानकारी के अनुसार सोमवार की रात गर्मी की वजह से लगभग साढ़े 8 बजे स्टील नगर केम्प-1 निवासी बृजेश राय का 14 वर्षीय पुत्र अंकित बाथरूम में नहाने के दौरान कूलर बॉडी के करेंट की चपेट में आ गया था। दूसरे कमरे में माँ गायत्री ने जब गिरने की आवाज सुनी तो बाथरूम पहुँच उन्होंने देखा कि गिली फर्श पर अंकित का एक हाथ कूलर की बॉडी से चिपका था तथा उस हाथ के बल पर अंकित का पूरा शरीर फर्श पर गिर तड़प रहा था। उसके पास जाने के प्रयास में गायत्री को भी करेंट के झटके महसूस हुए नतीजतन उसने लकड़ी की मदद से बिजली का मेन स्वीच नीचे गिराया और आ कर अंकित को उठाया। इन सब घटनाक्रम में लगभग 6 से 7 मिनट अंकित करेंट के प्रवाह में रहा जिससे वह मूर्छित हो गया था।
अंकित को तत्काल बीएम शाह हास्पिटल लाया गया जहां केजुअल्टी चेकअप के दौरान ही उसके हृदय की धड़कने बंद हो गईं। डॉ. विकास अग्रवाल ने तत्काल उसे आईसीयू में वेंटीलेटर पर शिफ्ट किया। मां गायत्री सहित मोहल्ले के अन्य लोग भी केजुअल्टी में अंकित के हालात से अछूते नहीं रह पाये और वहां मां सहित परिजन बदहवास रोने बिलखने लगे। चिकित्सकीय स्टाफ ने ढाढस बंधाते हुए लगातार उपचार व सीपीआर जारी रखा अंतत: लगभग डेढ़ घंटे बाद अंकित की धड़कने लौट आईं। उसके बाद रात भर टीम उसे बचाने जी-जान से जुटी रही और यह प्रयास सफल हुआ।
डॉ. विकास अग्रवाल ने बताया कि कार्डियो पल्मोनरी रिसशिटेशन (चेस्ट कम्प्रेशन) से हृदय की धड़कने लौटने के चांसेस होते हैं। दिल धड़कन रूकने की वजह से हार्ट, ब्रेन, किडनी, लीवर को रक्त संचार समुचित मात्रा में न मिल पाने की वजह से उसके आर्गन्स काम करना बंद कर देते हैं और मरीज की मौत हो जाती है। उन्होंने बताया कि यह बड़ा ही रेयर केस था जिसमें डेढ़ घंटे सीपीआर किया और उसके बाद भी ब्रेन, किडनी, लीवर डैमेज नहीं हुआ। अंकित पूरी तरह स्वस्थ है, उसके शारीरिक अंग पूरी तरह कार्य कर रहे हैं। यह मेडिकल लैंग्वेज में हमारे लिए किसी मिरेकल से कम नहीं है।
बीएम शाह हास्पीटल के डीएनबी मेडिसीन डॉ. विकास अग्रवाल ने बताया कि सीपीआर बहुत इफेक्टिव होना चाहिए, चेस्ट कम्प्रेशन किस रेट में दें तथा किस टाईमिंग पर स्टार्ट किया गया, यह बहुत मायने रखता है। मरीज को कार्डियक अरेस्ट होने के लिए कुछ मिनटों में ही अगर हम चेस्ट कम्प्रेशन स्टार्ट कर देते हैं तो चांसेस ऑफ रिकवरी बढ़ जाती है। सीपीआर सामान्यत: 15 से 20 मिनट करने के बाद अगर हार्ट बिट स्टार्ट नहीं होती है तो सामान्य तौर पर मरीज को मृत घोषित कर दिया जाता है।
यंग बच्चों में री जनरेशन की क्षमता बहुत अधिक होती है, सामान्यत: एडल्ट पेशेंट में देखा गया तथा मेडिकल जर्नल्स व बुक्स भी यही बताती हैं कि आधे से पौन घंटे तक चेस्ट कम्प्रेशन के बाद अगर धड़कन चालू नहीं होती तो पेशेंट को मृत घोषित कर दिया जाता है। डॉ. अग्रवाल ने बताया कि हृदय धड़कन चालू होने के बाद भी अगर मरीज का लीवर, किडनी, ब्रेन को बराबर मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिल पाती तो सारे आर्गन्स काम करना बंद कर देते हैं और मरीज की अगले 24 से 48 घंटे के भीतर मौत हो जाती है लेकिन अंकित के सारे आर्गन्स स्वस्थ थे और उसमें रीजनरेशन की क्षमता अधिक थी। साथ ही बीएम शाह हास्पीटल के आईसीयू की क्रिटिकल केयर टीम ने साइंटिफिक वे में इफेक्टिवली चेस्ट कम्प्रेशन लगातार जारी रखा। आखिरी दम तक हिम्मत नहीं हारी, क्रिटिकल केयर मेडिसीन भी समुचित व सुव्यवस्थित ढंग से दी जाती रही नतीजतन लगभग डेढ़ घंटे का प्रयास रंग लाया। अंकित की न केवल हार्ट बिट शुरू हुई बल्कि 48 घंटे के भीतर वह पूरी तरह री-कवर हो गया।
अंकित की किडनी, लीवर, ब्रेन बिना किसी डेमेज के अब पूरी तरह सामान्य रूप से काम कर रहे हैं। वह सचेत और ठीक ढंग से बातचीत कर रहा है। वेंटीलेटर से हटा कर उसे आईसीयू बेड पर लाया गया है। भोजन व अन्य क्रियाकलाप व्यवस्थित ढंग से कर पाने अब अंकित सक्षम है। शांति नगर की मार बेसेलियस विद्या भवन स्कूल में कक्षा नवमीं का छात्र अंकित दो बड़ी बहनों में अकेला भाई है। उसको मिले जीवनदान से पूरा रॉय परिवार खुशियां मना रहा है। डॉ. विकास अग्रवाल, डॉ. नेम सिंह, अकांक्षा, डोमन, अमित द्विवेदी, यशोदा व लीना की इस चिकित्सकीय टीम का न सिर्फ परिवार बल्कि मोहल्ले के लोगों ने भी हास्पीटल पहुँच आभार माना है।
डॉ. नेम सिंह ने बताया कि इतने समय तक करेंट की चपेट में होने के बाद अमूमन हृदय की धड़कन आसामान्य होने के आलावा ब्रेन डेमेज की आशंका, मरीज सुप्तावस्था में चला जाता है, उसकी मांस पेशियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं साथ ही किडनी फंक्शन भी पूरी तरह प्रभावित हो जाता है। चेस्ट कम्प्रेशन प्रोसेस आम नागरिकों को भी मालूम होने से लगभग 50 फीसदी लोगों को मौत से बचाया जा सकता है क्योंकि धड़कन बंद होने के बाद चेस्ट कम्प्रेशन वायटल आर्गन्स को सपोर्ट करता है। 

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

अगर कभी भगवान् के आगे हाथ जोड़ा है तो...........

पाँच पाण्डव तथा सौ कौरवों के नाम ये थे :–
पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं -
1. युधिष्ठिर
2. भीम
3. अर्जुन
4. नकुल
5. सहदेव
( इन पांचों के अलावा , महाबली कर्ण भी कुंती के ही पुत्र थे , परन्तु उनकी गिनती पांडवों में नहीं की जाती है )
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यहाँ ध्यान रखें कि… पाण्डु के उपरोक्त पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन
की माता कुन्ती थीं ……तथा , नकुल और सहदेव की माता माद्री थी ।
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वहीँ …. धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र….. कौरव कहलाए जिनके नाम हैं -
1. दुर्योधन
2. दुःशासन
3. दुःसह
4. दुःशल
5. जलसंघ
6. सम
7. सह
8. विंद
9. अनुविंद
10. दुर्धर्ष
11. सुबाहु
12. दुषप्रधर्षण
13. दुर्मर्षण
14. दुर्मुख
15. दुष्कर्ण
16. विकर्ण
17. शल
18. सत्वान
19. सुलोचन
20. चित्र
21. उपचित्र
22. चित्राक्ष
23. चारुचित्र
24. शरासन
25. दुर्मद
26. दुर्विगाह
27. विवित्सु
28. विकटानन्द
29. ऊर्णनाभ
30. सुनाभ
31. नन्द
32. उपनन्द
33. चित्रबाण
34. चित्रवर्मा
35. सुवर्मा
36. दुर्विमोचन
37. अयोबाहु
38. महाबाहु
39. चित्रांग
40. चित्रकुण्डल
41. भीमवेग
42. भीमबल
43. बालाकि
44. बलवर्धन
45. उग्रायुध
46. सुषेण
47. कुण्डधर
48. महोदर
49. चित्रायुध
50. निषंगी
51. पाशी
52. वृन्दारक
53. दृढ़वर्मा
54. दृढ़क्षत्र
55. सोमकीर्ति
56. अनूदर
57. दढ़संघ
58. जरासंघ
59. सत्यसंघ
60. सद्सुवाक
61. उग्रश्रवा
62. उग्रसेन
63. सेनानी
64. दुष्पराजय
65. अपराजित
66. कुण्डशायी
67. विशालाक्ष
68. दुराधर
69. दृढ़हस्त
70. सुहस्त
71. वातवेग
72. सुवर्च
73. आदित्यकेतु
74. बह्वाशी
75. नागदत्त
76. उग्रशायी
77. कवचि
78. क्रथन
79. कुण्डी
80. भीमविक्र
81. धनुर्धर
82. वीरबाहु
83. अलोलुप
84. अभय
85. दृढ़कर्मा
86. दृढ़रथाश्रय
87. अनाधृष्य
88. कुण्डभेदी
89. विरवि
90. चित्रकुण्डल
91. प्रधम
92. अमाप्रमाथि
93. दीर्घरोमा
94. सुवीर्यवान
95. दीर्घबाहु
96. सुजात
97. कनकध्वज
98. कुण्डाशी
99. विरज
100. युयुत्सु
( इन 100 भाइयों के अलावा कौरवों की एक बहन भी थी… जिसका नाम""दुशाला""था, जिसका विवाह"जयद्रथ"से हुआ था )
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"श्री मद्-भगवत गीता" के बारे में- किसको किसने सुनाई?
उ.- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई।
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कब सुनाई?
उ.- आज से लगभग 7 हज़ार साल पहले सुनाई।
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भगवान ने किस दिन गीता सुनाई?
उ.- रविवार के दिन।
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कोनसी तिथि को?
उ.- एकादशी
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कहा सुनाई?
उ.- कुरुक्षेत्र की रणभूमि में।
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कितनी देर में सुनाई?
उ.- लगभग 45 मिनट में
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क्यू सुनाई?
उ.- कर्त्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्त्तव्य सिखाने के लिए और आने वाली पीढियों को धर्म-ज्ञान सिखाने के लिए।
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कितने अध्याय है?
उ.- कुल 18 अध्याय
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कितने श्लोक है?
उ.- 700 श्लोक
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गीता में क्या-क्या बताया गया है?
उ.- ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है।
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गीता को अर्जुन के अलावा और किन किन लोगो ने सुना?
उ.- धृतराष्ट्र एवं संजय ने
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अर्जुन से पहले गीता का पावन ज्ञान किन्हें मिला था?
उ.- भगवान सूर्यदेव को
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गीता की गिनती किन धर्म-ग्रंथो में आती है?
उ.- उपनिषदों में
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गीता किस महाग्रंथ का भाग है....?
उ.- गीता महाभारत के एक अध्याय शांति-पर्व का एक हिस्सा है।
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गीता का दूसरा नाम क्या है?
उ.- गीतोपनिषद
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गीता का सार क्या है?
उ.- प्रभु श्रीकृष्ण की शरण लेना
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गीता में किसने कितने श्लोक कहे है?
उ.- श्रीकृष्ण ने- 574
अर्जुन ने- 85
धृतराष्ट्र ने- 1
संजय ने- 40.
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अधूरा ज्ञान खतरना होता है। 33 करोड नहीँ 33 कोटि देवी देवता हैँ हिँदू
धर्म मेँ। कोटि = प्रकार। 

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देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है, कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता। हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार करने के लिए ये बात उडाई गयी की हिन्दुओ के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो मुर्ख हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मेँ: 12 प्रकार हैँ आदित्य: , धाता, मित, आर्यमा, शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष, सविता, तवास्था, और विष्णु...! 
8 प्रकार हैँ वासु:, धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष। 
11 प्रकार हैँ- रुद्र: ,हर, बहुरुप,त्रयँबक, अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी, रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली। 
एवँ दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार।
कुल: 12+8+11+2=33.

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अगर कभी भगवान् के आगे हाथ जोड़ा है
तो इस जानकारी को अधिक से अधिक
लोगो तक पहुचाएं।

गुरुवार, 27 जून 2013

एक बार एक किसान की घड़ी कहीं खो गयी. वैसे
तो घडी कीमती नहीं थी पर किसान उससे
भावनात्मक रूप से
जुड़ा हुआ था और किसी भी तरह उसे वापस
पाना चाहता था.
उसने खुद भी घडी खोजने का बहुत प्रयास
किया, कभी कमरे में
खोजता तो कभी बाड़े तो कभी अनाज के ढेर में
….पर तामाम
कोशिशों के बाद भी घड़ी नहीं मिली. उसने
निश्चय
किया की वो इस काम में बच्चों की मदद
लेगा और उसने आवाज
लगाई , ” सुनो बच्चों , तुममे से जो कोई
भी मेरी खोई घडी खोज
देगा उसे मैं १०० रुपये इनाम में दूंगा.”
फिर क्या था , सभी बच्चे जोर-शोर दे इस काम
में लगा गए…वे
हर जगह की ख़ाक छानने लगे , ऊपर-नीचे ,
बाहर, आँगन में ..हर
जगह…पर घंटो बीत जाने पर भी घडी नहीं मिली.
अब लगभग सभी बच्चे हार मान चुके थे और
किसान
को भी यही लगा की घड़ी नहीं मिलेगी, तभी एक
लड़का उसके
पास आया और बोला , ” काका मुझे एक
मौका और दीजिये, पर
इस बार मैं ये काम अकेले ही करना चाहूँगा.”
किसान का क्या जा रहा था, उसे तो घडी चाहिए
थी, उसने तुरंत
हाँ कर दी.
लड़का एक-एक कर के घर के कमरों मेंजाने
लगा…और जब वह
किसान के शयन कक्ष से निकला तो घड़ी उसके
हाथ में थी.
किसान घड़ी देख प्रसन्न हो गया औरअचरज से
पूछा ,” बेटा,
कहाँ थी ये घड़ी , और जहाँ हम सभी असफल
हो गए तुमने इसे
कैसे ढूंढ निकाला ?”
लड़का बोला,” काका मैंने कुछ नहीं किया बस मैं
कमरे में गया और
चुप-चाप बैठ गया, और घड़ी की आवाज़पर ध्यान
केन्द्रित करने
लगा , कमरे में शांति होने के कारणमुझे
घड़ी की टिक-टिक सुनाई
दे गयी , जिससे मैंने
उसकी दिशा काअंदाजा लगा लिया और
आलमारी के पीछे गिरी ये घड़ी खोज निकाली.”
Friends, जिस तरह कमरे की शांति घड़ी ढूढने में
मददगार साबित
हुई उसी प्रकार मन की शांति हमें life
की ज़रूरी चीजें समझने में
मददगार होती है . हर दिन हमें अपनेलिए
थोडा वक़्त
निकालना चाहिए , जिसमे हम बिलकुल अकेले हों ,
जिसमे हम
शांति से बैठ कर खुद से बात कर सकें और अपने
भीतर
की आवाज़ को सुन सकें , तभी हम life को और
अच्छे ढंग से
जी पायेंगे...

मंगलवार, 25 जून 2013


"सचमुच, सोने की चिड़िया "था" हमारा देश.....अब नहीं"
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बदन पर "रौशनी" ओढ़ी है सबने,
अंधेरा "रूह" तक फैला हुआ है...,
सुना है और इक भूखा भिखारी,
खुदा का नाम लेते "मर" गया है।।
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दोस्तो, केदारनाथ में महामारी का डर, सामूहिक अग्नि संस्कार की तैयारी, लकड़ी घी के इंतजाम के निर्देश, पुजारियों से मदद का आग्रह...................
केदारनाथ लूटपाट, बाबाओं से लाखों बरामद, बैंक से लूटे 83 लाख, 125 रूपये का एक पराठा, 120 रूपये में पीने का पानी.......
हृदय द्रवित करती हैं ऐसी खबरें.........सचमुच, सोने की चिड़िया "था" हमारा देश.....अब नहीं
(संतोष मिश्रा)
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रविवार, 16 जून 2013


बच्ची का था इलाज महंगा, गरीब माँ-बाप ने जान ले ली
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आज जब लोग फादर्स डे की बधाईयां देते "संडे" इंज्वाय कर रहे हैं.....अगरतला में एक दिहाड़ी मजदूर और उसकी पत्नी ने छः महीने की बच्ची के इलाज का महंगा खर्च न वहन कर पाने की वजह से उसकी हत्या कर शव घर के नजदीक एक नाले में फेंक दिये जाने की घटना ने मेरे जेहन को झिंझोड़ दिया है।

पुलिस ने बीमार बच्ची के पिता लाबा देबनाथ को गिरफ्तार कर लिया जिसने पत्नी के साथ मिल कर अपनी बेटी लीना की हत्या कर उसे घर के नजदीक एक नाले में फेंकने की बात कबूल कर ली।
बच्ची के पिता लाबा ने बताया कि लीना को टिटनस का संक्रमण होने से रक्तस्त्राव हो रहा था। चिकित्सकों ने प्रत्येक दिन 1500 रूपये की दवा और 900 का एक इंजेक्शन लगाए जाने की सलाह दी थी। घर के इकलौते कमाऊ व्यक्ति एवं दिहाड़ी मजदूर लाबा को पांच सदस्यीय परिवार चलाना पड़ता है और बच्ची के इलाज का खर्च जुटाना उसकी चादर से कहीं ज्यादा था, कैसे फैलाता वह पांव। परिवार ने गांव की पंचायत तथा स्थानीय प्रशासन से मदद की गुहार लगाई थी लेकिन कोई "मदद" नहीं मिली..।

मैं सोच रहा घोटालों के इस देश में जहां डा. मनमोहन सिंह ने स्मार्ट कार्ड जैसी कई योजनाएं चलाई हैं, सभी को दो जून की रोटी मिल सके इसके सभी प्रयास किये गये हैं मगर यह भी सच है कि प्रयास जमीनी नहीं "कागजी" ज्यादा हो गये हैं......!
ऐसी हृदय विदारक घटनाएं सचमुच देश के उन सभी जिम्मेदारों को "चुल्लु भर पानी देने" विवश करती हैं जो जिम्मेदारियां लिये हैं और केवल अपने घर भर रहे हैं......, ऐसी घटनाओं के बाद भी कैसे उतरता होगा अन्न इनके गले की हलक से नीचे......? सचमुच शर्म और नैतिकता मेरे देश से उसी तरह खत्म होती जा रही जैसे इसे मिला सोने की चिड़िया का "तमगा"..................(संतोष मिश्रा) - 16 जून 2013

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

मन के नैन हजार.......: " स " से सावधान .................अजीब लग रहा हैं ...

मन के नैन हजार.......: " स " से सावधान .................
अजीब लग रहा हैं ...
: " स " से सावधान ................. अजीब लग रहा हैं न ?पर ये सच्चाई है महिलाओं के लिये पहला " स " तो " सगाई " से ही शुरू हो जाता है उससे निज...
" स " से सावधान .................
अजीब लग रहा हैं न ?पर ये सच्चाई है महिलाओं के लिये पहला " स " तो " सगाई " से ही शुरू हो जाता है उससे निजात मिलती है तो " सास " सामने आ जाती है जो "साँस " तक लेने नही देती है उनसे बची तो "सार्स " यानि चीनी की बिमारी भी इनकी पक्की सहेली होती है ,श्रंगार प्रेमी होने के कारण " सोने " से भी डर, बच गये तो नये शत्रु यानी " सफर " "सड़क " और यहाँ तक की "सहेलियाँ "भी कम खतरा नही होती ,उनका "सनम " न ले उडें ,पर सबसे बड़ा खतरा तो "सजन " के रूप में आता है फिर" शरारत " " शराब " जिनसे बचने के लिये "सजना " संवरना " पड़ता है एक और खतरा इन्तजार में ही रहता है "सौत " के रूप में ,जिससे "सपने " में भी डर लगता है |ये सभी " स " एक " सदमे " का रूप ले लेते हैं |
तभी तो कहता हूँ महिलाएं पुरुषों से ज्यादा भावुक होती हैं " संकट " में फसे व्यक्तियों को "संकट " से छुटकारे के लिये "समझाने " लगती हैं यही समझाना ही उनके लिये "संकट " बन जाता है "सफाई " भी देनी पडती है सो अलग ,है न "स " खतरनाक क्रपया "स " से दूर ही रहे ,ये भी एक विडम्बना ही ही है मेरा नाम भी तो "स " से ही है .......................

शनिवार, 22 सितंबर 2012


रविवार, 16 सितंबर 2012

मन के नैन हजार.......: ‎"मैं ऐसी कविता लिखना चाहता हूं, जो मुझसे बात करे...

मन के नैन हजार.......:
‎"मैं ऐसी कविता लिखना चाहता हूं, जो मुझसे बात करे...
: ‎"मैं ऐसी कविता लिखना चाहता हूं, जो मुझसे बात करे। जो एक व्यक्ति के मन से बात करे, उसका मर्म समझे। और एक व्यक्ति क्या, जो समूची आवाम का द...

‎"मैं ऐसी कविता लिखना चाहता हूं, जो मुझसे बात करे।

जो एक व्यक्ति के मन से बात करे, उसका मर्म समझे।

और एक व्यक्ति क्या, जो समूची आवाम का दर्द समझे।

मैं ऐसी कविता लिखना चाहता हूं, जो मिट्टी के बारे में हो।

प्रेम की वेदना के बारे में हो, दो जून रोटी की शिद्दत जो समझे।

जेल से लौटे कैदियों की मनः स्थिति व आजादी को जो बता सके।

जो मृत्यु से भय खाने वाले आदमी का भयभीत सा चेहरा दिखा सके।

और उस आदमी का हौसला बता सके जो मौत के आगे सीना ताने खड़ा हो।"

शनिवार, 7 जुलाई 2012

कबाडिय़ों को नीलाम हो रही बीमारियां - मेडिकल वेस्ट बेच रहा है ई टेक ग्रुप


-- संतोष मिश्रा-- 09329117655
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07 जुलाई 2012 - भिलाई - छत्तीसगढ़
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स्वास्थ्य सेवाओं की उत्कृष्टता बनाये रखने जहां मेकाहारा रायपुर, जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय सेक्टर-9, अपोलो बीएसआर हास्पिटल सहित जिला अस्पताल दुर्ग चिकित्सा के क्षेत्र में नित नये आयाम गढ़ते हुए न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि राज्य से लगे अन्य प्रदेशों से भी मरीजों को चंगा करने का इतिहास बनाते रहे हैं बल्कि प्रदेश के कुछ चिकित्सालय दीगर क्लिष्ट बिमारियों से पीडि़त मरीजों को विशेषज्ञता के साथ स्वस्थ कर अपने माथे सितारे जडऩे में सफल रहे हैं। उनकी सफलता और ख्याति के बीच अनेक ऐसी घटनाएं भी घटीं जो समय समय पर हास्पिटल प्रबंधन को कठघरे में खड़ा कर देती थीं। जन स्वास्थ्य से जुड़ा एक और ऐसा संवेदनशील मुद्दा नजर के सामने आ खड़ा हुआ है जो चिकित्सा जगत में प्रदेश के लिए बदनुमा दाग साबित होगा। 
वर्षों से भिलाई के औद्योगिक क्षेत्र में चंद रूपयों के लिए लोगों के स्वास्थ्य से न सिर्फ खिलवाड़ हो रहा है बल्कि जाने कितनी जानी अनजानी बिमारियाँ व संक्रमण व्यावसायिकता के इस दौर में लोगों को अपना शिकार बना चुके होंगे। लोगों की जिंदगी से एक ऐसा भयानक खेल, जो कि चिकित्सा व्यवसाय से जुड़े लोगों, स्वास्थ्य विभाग, पर्यावरण विभाग और पुलिस विभाग की नजरों के सामने से जाने-अनजाने न जाने कितनी बार गुजरा होगा लेकिन इसे रोकने किसी प्रकार की पहल तो दूर किसी ने जनस्वास्थ्य के इस मसले पर कभी मानों पड़ताल तक नहीं की। यह मामला है भिलाई के लाईट इण्डस्ट्रीयल एरिया स्थित मेडिकल वेस्ट डिस्पोज प्लांट का, जहां का मैनेजमेंट चंद रूपयों की अवैध कमाई के लिए संक्रमित सिरिंज, वायल इंजेक्शन, एंपुल, आईवी सेट, वीपी सेट, कैथेटर्स, दास्ताने पिछले कई वर्षों से शासन-प्रशासन की आंख में धूल झोंकते हुए कबाडिय़ों को बेचता रहा है। मेडिकल वेस्ट खरीदने कबाडिय़ों के बीच की होड़ इस अंदेशे से कत्तई इंकार नहीं किया जा सकता कि ऐसी चीजें कबाडिय़ों के गोदाम से दोबारा इस्तेमाल के लिए अस्पताल व मेडिकल स्टोर्स पहुँच रही हैं। भिलाई, दुर्ग, रायपुर में तो मेडिकल वेस्ट की मांग बढ़ी ही है लेकिन जानकारी के अनुसार दिल्ली से अनेक सौदागर इन कबाडिय़ों से इतनी अधिक मात्रा में डिमांड कर रहे हैं कि मुँह मांगे दाम पर इसकी पूर्ति न कर पाने का मलाल कबाडिय़ों के बीच साफ तौर पर देखा जा सकता है।

छत्तीसगढ़ के रायपुर, भिलाई, दुर्ग के आलावा हैदराबाद, मध्यप्रदेश के भोपाल व इंदौर स्थित अस्पताल, पैथालॉजी लैब, एलोपेथिक डाक्टर्स क्लिनिक व डायग्नोस्टिक सेंटर्स से ई-टेक प्रोजेक्ट प्रायवेट लिमिटेड को मेडिकल वेस्ट डिस्पोज-ऑफ करने का ठेका दिया गया है। ई-टेक ग्रुप छत्तीसगढ़ में रायपुर, दुर्ग, भिलाई के लगभग 190 अस्पताल, 95 पैथालॉजी लैब, हजार से अधिक एलोपेथिक डाक्टर्स क्लिनिक व लगभग 45 डायग्नोस्टिक सेंटर्स से मेडिकल वेस्ट उठाता है तथा भिलाई के 172-ए लाईट इण्डस्ट्रीयल एरिया स्थित ट्रीटमेंट प्लांट में सरकारी व निजी अस्पतालों का बायो मेडिकल वेस्ट इंसीनेटर में जला कर डिस्पोज ऑफ करता है। औद्योगिक क्षेत्र में ई-टेक ग्रुप ने क्षेत्रीय पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड से एनओसी ले रखी है। इस काम के ठेके की आड़ में ई-टेक ग्रुप मेडिकल वेस्ट डिस्पोज करने की बजाय लम्बे समय से एक गैर कानूनी धंधा भी संचालित करता रहा है, और यह कारोबार है वेस्ट की छटाई कर उसे कबाडिय़ों को बेचना। 

ई-टेक प्रोजेक्ट प्रायवेट लिमिटेड में पिछले तीन दिनों से नजर रखने और बातचीत के दौरान अनेक ऐसे खुलासे हुए हैं जो आसानी से यह साबित करते हैं कि चंद रूपयों के सामने मानवीय संवेदना को ताक पर रख यह ग्रुप और क्षेत्र के कबाड़ी आसानी से जाने कितनी जिंदगियों से खिलवाड़ करने जरा भी नहीं हिचकते। इस प्लांट से मेडिकल वेस्ट का 80 फीसदी हिस्सा हर रोज कबाड़ तक पहुँच रहा है और कबाड़ी इन्हीं संक्रमित वेस्ट को इकट्ठा कर राजधानी रायपुर से दिल्ली तक पहुँचा रहे हैं। 

00 नियम कानून ताक पर-खामियों से भरा ई टेक प्लांट
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बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट एण्ड हैण्डलिंग रूल्स 1998 व संशोधित प्रारूप 2000 के मुताबिक मेडिकल वेस्ट का उचित ढंग से निपटारा करना लाजिमी है। बिना नष्ट किए वेस्ट फेंकना भी जुर्म की श्रेणी में रखा गया है। वेस्ट डिस्पोज-ऑफ के लिए पीला, नीला, लाल, काला बैग या कंटेनर प्लांट में जरूरी है। पीला कंटेनर-संक्रमित वेस्ट जैसे गोज, बैंडेज, मानव अंग के टुकड़े, मवाद, ड्रेसिंग, नीला कंटेनर-सीरिंज, वायल इंजेक्शन, एंपुल, कांच के सामान, लाल कंटेनर-प्लास्टिक से संबंधित आईवी सेट, वीपी सेट, कैथेटर्स, दास्ताने, काला कंटेनर-साधारण वेस्ट, खाने-पीने व मरीजों की जूठन के लिए निश्चित किया गया है लेकिन ई-टेक प्लांट में ये सारी वस्तुएं नहीं हैं क्योंकि यहां अधिकांश वेस्ट धड़ल्ले से बेच दिया जा रहा है। नियम के मुताबिक बायो वेस्ट अन्य कचरे में नहीं मिलना चाहिए, साथ ही भण्डारण, परिवहन, उपचार और निपटान के लिए कंटेनर या बैग अलग होने चाहिए। कंटेनर में अपशिष्ट का लेबल भी आवश्यक है। वेस्ट को 48 घंटे के भीतर संग्रहित तथा डिस्पोज-ऑफ करना होता है लेकिन ई-टेक प्लांट में कबाडिय़ों ने किराये पर कमरे भी ले रखे हैं जिनमें उनका वेस्ट जमा हो कर अलग-अलग दिन मेटाडोर में लोड हो कर गोदाम तक पहुँचता है। प्लांट में ग्लूकोज बोतल, सिरिंज, दास्ताने, आईवी सेट, कैथेटर्स, इंजेक्शन, एंपुल की डिमांड के अनुसार छटनी करने वाले दिहाड़ी मजदूर 100 रूपये की रोजी और कबाडिय़ों के कमीशन पर घंटों बिना मॉस्क और दास्ताने के काम करते हैं। कोई भी संक्रामक डिस्पोजल सिरिंज इन्हें जिंदगी भर के लिए किसी भी भयानक बीमारी का शिकार बना सकती है।

बिना पहचान मेडिकल वेस्ट का सौदा व निर्धारित दाम का जिक्र करते हुए यहां के सुपरवाईजर इकराम भाई वेस्ट को डिस्पोज ऑफ करने का पूरा तरीका बताते हैं, वो जानते हैं कि सिरिंज, आईवी सेट, कैथेटर्स, दास्ताने संक्रमित हैं, इन्हें इंसीनेटर में जला कर खत्म करना ही उनकी ड्यूटी है। रि-सायकल प्रोसेस में सभी वेस्ट की छटनी कर अलग-अलग तापमान पर जला कर खत्म करना है। प्लास्टिक को निश्चित तापमान में आटो क्लेव में डाल कर उबालना है, फिर ग्राइंडर में कटिंग के बाद मेल्ट करना है, इसके बाद गिट्टा बना कर स्टेंडर्ड दाना में परिवर्तित करना है। तब कहीं जा कर प्लास्टिक का उपयोग कर सकते हैं लेकिन लम्बे समय से आटो क्लेव का प्रयोग यहां नहीं किया जा रहा है। बात ही बात में इकराम यह भी बता गया कि मेडिकल वेस्ट चार-पांच वर्षों से यह प्लांट बेच रहा है, जिस कबाड़ी या पार्टी का ऊंचा भाव माल उसी को जायेगा। भिलाई ही नहीं ज्यादा डिमांड होने पर अच्छे दाम मिलते हैं तो इंदौर प्लांट से भी माल उठवाने का जिम्मा सुपरवाईजर व मैनेजर का है बशर्ते दाम ठीक समय पर और सही मिले। इकराम ने बताया कि कम्पनी के मैनेजर सिराजुल भाई भोपाल में रहते हैं तथा हर तीन माह में विजिट कर कबाडिय़ों का हिसाब ले कर चले जाते हैं। ग्रुप के डायरेक्टर दो वर्ष पहले एक बार छत्तीसगढ़ आए थे और रायपुर के एक होटल में दो दिन रूकने के बाद हिसाब ले वो भी चले गये थे। 48 घंटे के भीतर वेस्ट को डिस्पोज-ऑफ करने के नियम संबंधी सवाल के जवाब में इकराम ने बताया कि माल इतना ज्यादा होता है कि छटनी में ही घंटों बीत जाते हैं हालांकि दोनो शिफ्ट में मजदूर लगाये जाते हैं लेकिन माल वही जलाया जाता है जो बिकता नहीं।
कुछ महीने पहले आग लगने से प्लांट का शेड भी क्षतिग्रस्त हुआ है, इंसीनेटर कैपेसिटी माल की तुलना में कम है इसलिए आधे से अधिक वह वेस्ट जो कबाड़ी नहीं खरीते इंसीनेटर के बगल में ही जमा कर आग लगा दी जाती है। इसका जहरीला धुआं चिमनी की बजाय शेड की जर्जर छत से निकल पीछे बसी आवासीय श्रमिक बस्ती तक पहुँच रहा है। बस्ती के लोग परेशान जरूर हैं लेकिन सामान्य धुआं समझ प्लांट की मनमानी वर्षों से सह रहे हैं।
यह प्लांट सुपरवाईजर इकराम की देख-रेख में संचालित होता है, वो भी सिर्फ तीन घंटे के लिये प्लांट आता है। इस दौरान कौन से कबाड़ी को कितना वेस्ट भेजना है, इसका आर्डर व रूपये लेने के बाद वेस्ट की तौल तक का काम पूरी जिम्मेदारी से करता है। बचा वेस्ट जलाना होता है जो कि मजदूर यहां दो शिफ्ट में पूरा करते हैं। 

00 जिसके दाम ऊंचे-मेडिकल वेस्ट उसी कबाड़ी का............
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मेडिकल वेस्ट के सौदागर बने इस प्लांट में छत्तीसगढ़ संवाददाता को प्लांट में ही सुपेला संजय नगर स्थित एस के प्लास्टिक से पहुँचे इजहार कबाड़ी ने बताया कि वह पिछले चार वर्षों से नियमित तौर पर ई-टेक से वेस्ट खरीद रहा है। लगभग 20 टन वेस्ट जमा होने के बाद वह अलग-अलग पार्टियों को पिछले 12 वर्षों से दिल्ली में सप्लाई कर रहा है। रायपुर व भिलाई में भी ग्लूकोज बोतल, निडिल, सिरिंज के खरीददार अब मिलने लगे हैं। दिल्ली की पार्टियों की जितनी डिमांड होती है उतना माल मिलना संभव न होने पर गोदाम में इकट्ठा करते हैं क्योंकि उनकी बोली ऊंची होती है। जिस कबाड़ी के पास कम माल होता है उसे रायपुर व भिलाई के व्यापारी खरीदते हैं। इजहार व आजाद (कबाड़ी) ने जानकारी दी कि सुपेला सहित दुर्ग व रायपुर के अधिकांश कबाड़ी मेडिकल वेस्ट की डिमांड पिछले कुछ वर्षों से बढऩे की वजह से इस धंधे में आ गए हैं पहले मेडिकल वेस्ट में कुछ ही कबाडिय़ों की मोनोपॉली थी। कई शहरों में सीधे नर्सिंग होम भी उनसे डीलिंग करते हैं। मेडिकल वेस्ट का दिल्ली में क्या उपयोग हो रहा है, ये खुद कबाड़ी भी नहीं जानते उन्हें तो बस रूपयों की चमक उसी तरह अंधा कर गई है जैसे वर्षों से मेडिकल वेस्ट डिस्पोज ऑफ करने वाले ई-टेक ग्रुप को।

सुपेला संजय नगर पहुँचने पर एस के प्लास्टिक सहित कईयों के गोदाम में ग्लूकोज बोतल, कैथेटर्स, आईवी सेट से भरे झाल रखे मिले। यहां कबाडिय़ों ने एक व्यापारी के रूप में पहुँचे संवाददाता को सबके दाम भी बताए। कबाडिय़ों के मुताबिक सिरिंज 50 रूपये किलो, आईवी पाईप 40 रूपये किलो, निडिल 28 रूपये किलो तथा ग्लूकोज बोतल 26 रूपये किलो कबाड़ बाजार में बिक रही है। डायरेक्ट दिल्ली सप्लाई करने पर मनमाफिक दाम उन्हें मिलते हैं। एस के प्लास्टिक के मालिक आजाद के मुताबिक दिल्ली तक वो ही माल भेज पाते हैं बाकि छोटी मछलियां हैं, जो लोकल माल सप्लाई करती हैं।

00 कई बार रोकती है पुलिस-ले दे कर हो जाता है काम
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ई-टेक प्लांट सुपरवाईजर इकराम ने बताया कि फैक्ट्री से माल निकलने के बाद ट्रांसपोटिंग की सारी जवाबदारी कबाड़ी की है, बाहर पुलिस, प्रशासन को मेंटेन करना भी उसका ही रिस्क है। यहां से लम्बे समय से माल उठा रहे इजहार व आजाद ने संवाददाता को समझाईश देते हुए बताया कि मेडिकल वेस्ट गोदाम तक सुरक्षित ले जाना भी आसान काम नहीं है। प्लांट से दो रास्ते हैं और दोनों पर सेटिंग करनी पड़ती है। भिलाई क्षेत्र में लोहा कबाड़ काम बद होने से कई बार शक की बिनाह पर पुलिस वाले गाड़ी रोक माल गिरवा कर चेक करते हैं कि कहीं वेस्ट के नीचे लोहा तो नहीं है। किच-किच या अन्य कानूनी पचड़े से बचने हजार रूपये देने पड़ते हैं। गोदाम तक पहुँचने जामुल थाना, वैशाली नगर चौकी और सुपेला थाना छावनी चौक रूट से तथा पावर हाउस रूट हुआ तो छावनी थाना अक्सर झाल से भरे मेटाडोर को पुलिस का अदना सिपाही भी रोक देता है फिर पैसे देने ही पड़ते हैं।

00 एनओसी के बाद पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड झांकता तक नहीं.....
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ई-टेक प्रोजेक्ट प्रायवेट लिमिटेड को क्षेत्रीय पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड ने एनओसी दी हुई है तब से अब तक प्लांट में बोर्ड की कोई टीम आज तक नवहीं पहुँची। जर्जर शेड से निकलता मेडिकल वेस्ट का जहरीला धुआं और इसकी सडांध से पीछे बसी श्रमिक बस्ती और अगल-बगल के उद्योग कर्मचारी खासे परेशान हैं लेकिन इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। शासन-प्रशासन की इसी लापरवाही का नतीजा है कि आटोक्लेव जलने के बाद जीर्ण-शीर्ण शेड के नीचे मेडिकल वेस्ट जलाया जा रहा है और लापरवाही की हद का ही परिणाम है कि ई-टेक प्लांट मेडिकल वेस्ट को कबाड़ में बेचने का वर्षों से धंधा पूरी दबंगता के साथ बिना किसी भय-भ्रांति के करता रहा है।  

00 क्या अब भी नहीं खुलेगी स्वास्थ विभाग की नींद........?
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बायो मेडिकल वेस्ट डिस्पोज-ऑफ करने की बजाय कबाड़ी तक पहुँचना और यहां से लोकल व बाहरी बाजार में इसका व्यापार सचमुच स्वास्थ विभाग की कुंभकरणी नींद के हालात बयां करता है। बेलगाम ई-टेक प्लांट में वर्षों से यह खेल जारी है और स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार लोग ऐसे गैर कानूनी कार्यों पर नजर झुकाए रहें-यह अपने आपमें सवालिया निशान है। बायो मेडिकल वेस्ट से वायरस जनित बीमारियां एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी हो सकती है। इन्फेंक्शनव का भी खतरा होता है। टाइफाईड, इकोलाई, क्लेबसेला, स्यूडोमोनास, न्यूकॉकस, टीबी तथा वायरस से परजीवी संक्रमण जैसे जियार्डियासिस, कोलेरा का खतरा ई-टेक प्लांट की व्यावसायिकता के चलते कबाड़ और कबाड़ी से शहर भर में मंडरा रहा है। कबाडिय़ों के गोदाम में काम कर रहे पचासों छटाई मजदूर भी मिले जो बिना सुरक्षा उपकरणों के ऐसे वेस्टेज को सहेज रहे थे।  

00 विभागीय जांच में भी गड़बड़ी मिली थी-मालू
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छत्तीसगढ़ पर्यावरण नियंत्रण मंडल के क्षेत्रीय अधिकारी श्री मालू ने बताया कि ई-टेक प्रोजेक्ट को हास्पिटल, नर्सिंग होम और पैथालॉजी लैब से मिले वेस्ट का पूर्णत: निर्धारित तापमान पर विनिष्टिकरण करना है। समय-समय पर विभाग टीम सर्वे करती है, मेडिकल वेस्ट का ई-टेक ग्रुप द्वारा विक्रय किया जाना गलत है और इन्वायरमेंट प्रोटेक्शन एक्ट 1986 के खिलाफ है। इसी एक्ट की धारा 16 और 19 के तहत उसके खिलाफ प्रकरण बनता है। इसकी रिपोर्ट तैयार कर राज्य पर्यावरण नियंत्रण मंडल को भेजी जायेगी। श्री मालू ने बताया कि सामान्य जांच के दौरान विभाग ने पाया कि ई-टेक ग्रुप द्वारा मेडिकल वेस्ट डिस्पोज प्रोसेस को निर्धारित मापदंड पर नहीं किया जा रहा है। संबंधित रिपोर्ट हेड आफिस को भेजी गई है। आगे की कार्रवाई केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को ही करना है। 

00 कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए ईटेक पर-सीएमओ  
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जिला अस्पताल दुर्ग के सीएमओ डॉ. अजय दानी से जब ई-टेक द्वारा कबाडिय़ों को मेडिकल वेस्ट नीलाम किये जाने का खुलासा करने पर उन्होंने कहा कि यह मानव जाति के लिये बहुत ही खतरनाक व घिनौना काम किया जा रहा है, यह गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। जिन बिमारियों को खत्म करने इन मेडिकल उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है वह पूर्णत: इन्हीं बिमारियों से संक्रमित हो जाते हैं। ऐसे संक्रमित सिरिंज, दास्तानों को खुले रूप में कबाडिय़ों को नीलाम करना समाज में बीमारी परोसने के समान है। ई-टेक प्रोजेक्ट को केवल इसीलिये स्वीकृति दी गई थी कि वो मेडिकल अपशिष्ट का प्रबंधन करते हुए इसका भष्मीकरण करे। इस निष्पादन कार्य की बजाय ई-टेक प्रोजेक्ट ने मेडिकल व पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड के नियमों का उल्लंघन करता रहा है, इसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। 

00 मामला संज्ञान में आया है, कार्रवाई करेंगे-एएसपी
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अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक प्रशांत ठाकुर से छत्तीसगढ़ ने जब ई-टेक के व्यावसायीकरण को ले सवाल किये और इसकी रोक के लिये पुलिस विभाग की कार्रवाई की जानकारी मांगी तो श्री ठाकुर ने कहा कि खुलासा होने के बाद पुलिस के संज्ञान में यह संगीन अपराध सामने आया है, पुलिस ई-टेक के आलावा कबाडिय़ों के गोदामों में दबिश दे जल्द कड़ी कार्रवाई करेगी। 
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मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

जल्द नहीं उतर सकता "थर्ड आई" निर्मल बाबा का रंग


भिलाई के डहरिया परिवार ने मनाया जन्मदिन
-- संतोष मिश्रा--
लोग भले निर्मल बाबा के संबंध में कुछ भी कहें लेकिन उनके भक्तों का अटूट विश्वास कहीं कम नहीं हुआ है, यह दावा किया है भिलाई की कान्ट्रेक्टर कालोनी के डहरिया परिवार ने। इस परिवार का कहना है कि दसवंद पूजा और समागम में एक कुर्सी पाने की चाहत में आज भी कई भक्त रूपयों की गड्डी लिये खड़े हैं। टेलीविजन के वैज्ञापनिक समागम शो को देख कर पिछले पांच महीने से निर्मल बाबा ने कई लोगों के मन और घरों में आसानी से अपनी पहुँच बना ली है, नतीजतन भिलाई क्षेत्र से भी पिछले महीने निर्मल दरबार में लाखों रूपये गये हैं। कुछ परिवार तो ऐसे भी मिले जिनके घर भले रोजमर्रा के खर्च को रूपये कम पड़ रहे हों लेकिन वे बैंकों की कतार में खड़े अपनी आय का दस फीसदी हिस्सा जोड़ उसे जमा करने की होड़ में आज भी दिखाई देते हैं। कारण अंधश्रद्धा हो या फिर बिना परिश्रम आसानी से घर में भौतिक सुख और शांति की लालसा, जागरूकता की बयार अब भी कम पढ़े लिखे लोगों के मन में समा गई निर्मल बाबा की श्रद्धा के विमुख बहती नहीं दिखाई देती। भिलाई के एक परिवार ने कल बाकायदा आमंत्रण कार्ड छपवा निर्मलजीत सिंह नरूला का न सिर्फ जन्मदिन मनाया बल्कि डीजे की धुन में थिरकने के बाद सैकड़ों मेहमानों ने भंडारा में हिस्सा लेकर निर्मल बाबा के जयकारे भी लगाये। 
कान्ट्रेक्टर कॉलोनी निवासी दयाराम डहरिया का पूरा परिवार निर्मल बाबा की श्रद्धा में लवलीन है। इत्तेफाक से 16 अप्रैल को निर्मलजीत सिंह नरूला के जन्मदिन की जानकारी लगते ही इस परिवार ने 29 बरस से कभी न मनाये जाने वाले अपने बेटे राजेश के जन्मदिन को निर्मल बाबा की तस्वीर के साथ न सिर्फ धूमधाम से मनाया बल्कि मोहल्ले के आमंत्रित मेहमानों के समक्ष निर्मल बाबा के पॉवर का बखान करते हुए अपने परिवार की खुशहाली को उनकी कृपा का फल भी बताया। मध्यम वर्गीय परिवार के दयाराम ने तकरीबन 150 आमंत्रण कार्ड मोहल्ले और परिचितों के घर बांटे और निर्मल बाबा का जन्मदिन केक काटने के बाद सभी को दावत भी दी। दयाराम बताते हैं कि मीडिया की पहुँच से इस भव्य आयोजन को उन्होंने इसलिये दूर रखा है क्योंकि मीडिया निर्मल बाबा के खिलाफ भले हो गई है लेकिन उनका परिवार आज भी उन्हें उतनी ही श्रद्धा और भक्ति के माध्यम से देखता है। निर्मलजीत सिंह को साईं बाबा और शनिदेव का रूप बताते हुए दयाराम ने दावा किया कि पूजे जाने वाले सभी देवी देवताओं के समकक्ष आज भी निर्मल बाबा अनेक घरों में विराजमान हैं।    
जन्म से ही डहरिया परिवार ने घर के बेटे राजेश का जन्मदिन आज तक नहीं मनाया था। लेकिन इस बार जानकारी मिली कि निर्मल बाबा का जन्मदिवस उसी दिन है जिस दिन राजेश जन्मा था इसलिये दोनों का जन्मदिन धूमधाम से मनाने का निर्णय लेते हुए दयाराम ने सभी को आमंत्रित किया। दोपहर 2 बजे आमोद भवन के शिव मंदिर में निर्मल बाबा की तस्वीर ले खड़े राजेश ने रूद्राभिषेक व शिव पूजा की और 3 बजे से मंदिर प्रांगण में महाभोग और भण्डारा का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। शाम को बर्थडे ब्वाय राजेश और निर्मल बाबा के नाम से केक काटा गया और डीजे की धुन में नाचते सभी मेहमानों और आमंत्रित मोहल्लेवासियों ने रात्रि भोज का आनंद भी लिया।

निर्मल भले चम्बल का डाकू हो, कोई फर्क नहीं पड़ता-राजेश
निर्मलजीत सिंह भले चम्बल के डाकू क्यों न हों, उनका थर्ड आई पॉवर और उनका प्रभाव डहरिया परिवार और उनके अन्य भक्तों के विश्वास को कहीं डिगा नहीं सकता। डहरिया परिवार का 29 वर्षीय राजेश पहले तो चर्चा करने ना-नुकुर करता रहा लेकिन दयाराम के सहयोग के निर्देश के बाद राजेश ने खुल कर सभी सवालों के जवाब दिये। राजेश ने कहा कि सारा मीडिया निर्मल बाबा के प्रभाव को उनके भक्तों के मन से रत्ति मात्र भी खत्म नहीं कर सकता। निर्मल बाबा का अतीत भले कितना भी बुरा हो वो भले चम्बल के डकैत रहे हों या फिर चोर या बड़े लुटेरे ही क्यों न हों आज डहरिया परिवार उनके प्रभाव से ही इतना बड़ा आयोजन कर पाया है। राजेश ने बताया कि उनका परिवार पिछले पांच महीनों से निर्मल बाबा को देवता के समान ही पूजता है। टेलीविजन चैनल पर निर्मल समागम देख उनकी भक्ति लौ इस परिवार ने जलाई और दसवंद पूजा और समागम के लिये प्रति माह लगातार पारिवारिक सदस्यों द्वारा जमा किये गये रूपयों को निर्मल दरबार के खाता में जमा करने का सिलसिला पांच महीने से नहीं रूका है। 
राजेश डहरिया का मानना है कि आज निर्मल बाबा की भले सच्चाई खुल कर सामने आ रही है लेकिन उनके अतीत से कुछ लेना-देना नहीं है, उनका थर्ड आई पॉवर सर्वशक्तिमान है जिससे वे लोगों का दु:ख दूर कर रहे हैं। पेशे से ड्रायवर राजेश ने दिसंबर महीने में निर्मल बाबा का कार्यक्रम देखते हुए अपने लिये एक सायकल की मन्नत रखी और एक महीने के भीतर ही उसने स्कूटर खरीद लिया। जहां तक राजेश के संबंध में मोहल्ले के लोगों ने बताया कि कुछ महीने पहले ही राजेश की मोटर सायकल फायनेंस कम्पनी ने किश्त न पटाने पर वापस ले लिया। इस संबंध में किये गये सवाल पर राजेश का कहना है कि वो अतीत था, अब वर्तमान में उनके घर की कंडीशन निर्मल बाबा के आशिर्वाद से ठीक हो गई है, उसके जीजा को काम मिल गया है, गुमसुम रहने वाला उसका छोटा भाई अब हंसने बोलने लगा है, परिवार के सभी सदस्य नियमित रूप से सप्ताह के पांच दिन मंदिर जाते हैं वहां चढ़ावा भी देते हैं। 

जयकारे के बीच नारियल तड़क जाने की फैलाई खबर 
डहरिया परिवार में पहले राजेश अपनी वास्तविक उम्र इसलिये छिपा रहा था कि उसके विवाह में उम्र की सच्चाई बाधक बनेगी। बाईक की सीजिंग मामले में उसका जवाब था कि वो तो निर्मल बाबा के भक्त बनने से पहले का मामला था। निर्मल की भक्ति के बाद राजेश ने ड्रायवर का काम इसलिये छोड़ दिया क्योंकि वह किसी की बात या घुड़की नहीं सुनना चाहता। अब राजेश खुद के लिये कार लेना चाहता है, उसे विश्वास है कि निर्मल बाबा के बताये मार्ग पर चलने से जल्द ही कार उसके दरवाजे होगी। फिलहाल केटरिंग वर्क से वह खुश है और परिवार के सदस्य कमाई का 10 फीसदी हिस्सा निर्मल दरबार में हर माह डालते रहेंगे। जन्मदिन आयोजन में पहुँचे लोगों को निर्मल बाबा की पॉवर का बखान समय-समय पर करते हुए उनके प्रति लोगों में विश्वास जगाने का प्रयास भी डहरिया परिवार करते रहा। लगभग चार बजे यह बात प्रचारित की गई कि निर्मल बाबा को चढ़ाया गया नारियल अपने आप तड़क गया जो कि उनकी पॉवर का प्रभाव है। कार्यक्रम में कुछ लोग अनमने भाव से भी पहुँचे थे और सभी की जुबान पर निर्मल दरबार के नाम पर जमा किये गये करोड़ों रूपये का जिक्र था जिनका जवाब भी दूसरे लोग देते दिखाई दिये। दोपहर के आयोजन में लगभग 60 से 70 महिलाएं पहुँची थीं जिन पर निर्मल बाबा की भक्ति हावी दिखाई पड़ी। अधिकांश महिलाएं निरक्षर थीं लेकिन शाम को केक काटने के बाद सैकड़ों युवा डीजे की धुन पर थिरकते दिखाई पड़े। जिन पर निर्मल बाबा का प्रभाव कम ही दिखाई पड़ा वे तो दावत मिलने से ज्यादा खुश थे। 

नींद की नौटंकी करने वाले को जगाना मुश्किल-डॉ. दिनेश मिश्रा
अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ. दिनेश मिश्र ने डहरिया परिवार व निर्मल बाबा के संबंध में छत्तीसगढ़ से चर्चा में कहा कि जो व्यक्ति सोया हो उसे जगाया जा सकता है लेकिन जो जान बूझ कर आंखें बंद कर सोने का नाटक कर रहा हो वह चाह कर भी नहीं जगाया जा सकता। निर्मल बाबा के भक्त दूसरी ही श्रेणी के हैं जिनमें अंधश्रद्धा घर कर गई है। निर्मलजीत सिंह न तो किसी धर्म विशेष का शीर्षस्थ रहा है और न ही उसकी योग या किसी तरह की साधना के संबंध में सही जानकारी मिलती है, प्रायोजित लोगों के माध्यम से गलत तरीके और पूर्ति को लोगों के समक्ष समागम के जरिये परोसा गया और कम पढ़े लिखे लोग उस पर सहज ही विश्वास जगा बैठे। निर्मलजीत सिंह नरूला एक असफल व्यक्ति था जिसने खुद को स्थापित करने अनेक प्रयास किये जब सफल नहीं हुआ तो उसने थर्ड आई जागृत करने की बातें प्रचारित प्रसारित कर खुद की असीमित कमाई का जरिया ढूंढ लिया। मीडिया को भी व्यावसायिक नजरिये से ऐसे लोगों के वैज्ञापनिक आयोजनों को जनता के समक्ष नहीं परोसना चाहिए क्योंकि इससे कई लोगों के मन में भ्रम घर कर जाता है और इसकी परिणिति कहीं न कहीं जन-धन के अहित के रूप में सामने आती है। इसलिये खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया को ऐसे समागम जैसे विज्ञापनों का प्रसारण बंद करना चाहिए क्योंकि भारतवर्ष में एक बड़ा तबका ऐसे लोगों का है जो इन विज्ञापनों के पूर्व दिखाई जाने वाली सचेतक सूचना को पढ़ व समझ नहीं पाता। डहरिया परिवार जैसे अनेक लोग निर्मल बाबा के ढोंग के प्रभाव में हैं जिन्हें जल्द बाहर निकालना बहुत जरूरी है।
-----------------SANTOSH KUMAR MISHRA--------------------------------------(17/04/2012)--------------

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

"गारंटी है क्या.............आपके पास.........! नहीं न.......फिर......?"

"जाके पांव न फटे विबाई.......वो क्या जाने पीर पराई..........?"
आम जुबान में कई लोग किसी भी किस्म की कमजोरी को गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं। गरीब को फटेहाल या दो कौड़ी का कहते हैं, किसी को लंगड़ा, किसी को लूला, पागल, अंधड़ा, कनवा.........! 
ये सारी जुबान तब तक तो ठीक है जब तक आपके परिवार में किसी को कुदरत से मिली ऐसी कोई तकलीफ न हो लेकिन जब घर पर कोई ऐसा हो तो क्या उस वक्त भी इसी तरह के शब्द उतनी ही आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं लोग.......? वैसे तो कहा गया है कि जिसके खुद के पैरों में विबाई न पड़ी हो वह दूसरों का दर्द क्या जाने लेकिन बेरहम और रहमदिल, अक्लमंद और नासमझ या कम समझ के बीच फर्क तो यही है कि दूसरों की भावनाओं को देखते हुए किसी ऐसी बात को गाली की तरह इस्तेमाल न करें जिस पर उनका कोई बस नहीं है।
"कुदरत को तौल करें फैसला........"
अगर कोई बद्तमीज है, घमंडी है, हिंसक है, भ्रष्ट या बेईमान है, दगाबाज या झूठा है तो ऐसी तमाम बातें कुदरत की दी हुई न हो कर लोगों की खुद की पाई हुई होती हैं।
किसी के बारे में न्यायसंगत तरीके से अगर ये बातें कहीं जाएं, तो ये गालियां नहीं हैं। बिना मेहनत जो दूसरों के हिस्से का खाता है, उसे हरामखोर कहने में भी कोई बुराई नहीं है, संसदीय व्यवस्था में इनमें से अधिकांश शब्दों को असंसदीय करार देकर निकाल दिया जाता है लेकिन जिम्मेदारी के साथ बोलचाल में इनके इस्तेमाल में कोई बुराई नहीं होती। किंतु जिन बातों पर किसी का बस नहीं चलता, जन्म से मिली हुई तकलीफों या साधारण रूप रंग को लेकर जब कोई जली-कटी जुबान का इस्तेमाल करता है तो वह यकीनन नाइंसाफी है। 
"गारंटी है क्या.............आपके पास, नहीं न....फिर......"
किसी दूसरे के बच्चे को काला-कलूटा कहने के पहले यग जरूर सोचें कि आपकी अगली पीढ़ी के रंग की आपको कोई गारंटी है....? मानसिक रूप से कमजोर या अविकसित किसी बच्चे को पागल कहने के पहले यह सोचें कि आपके परिवार में कोई ऐसा पैदा हो और उसे लोग इसी जुबान में बुलाएं तो आपको कैसा लगेगा.....?
...................(संतोष मिश्रा)

रविवार, 30 अक्टूबर 2011

SANTOSH MISHRA...: मेरी डाय़री के पन्ने में सिमटती......"डायन"

SANTOSH MISHRA...: मेरी डाय़री के पन्ने में सिमटती......"डायन": मेरी डाय़री के पन्ने में सिमटती......"डायन" ****************************** *************************** डायन वाली "खबर" आग की तरह पूरे देश...

SANTOSH MISHRA...: बदलने की प्रक्रिया

SANTOSH MISHRA...: बदलने की प्रक्रिया: समय की तकली में रूई की तरह कत रहा है "वर्तमान" और उसी तकली की बेंत पर सूत सा लिपट रहा है "भूत"। सूत के आदिम छोर को पकड़ धीरे-धीरे "वर्तमान...

बदलने की प्रक्रिया


समय की तकली में रूई की तरह कत रहा है "वर्तमान" और उसी तकली की बेंत पर सूत सा लिपट रहा है "भूत"।
सूत के आदिम छोर को पकड़ धीरे-धीरे "वर्तमान" तक जाओगे तो पता चलेंगी तुम्हें "विकास व सभ्यता" की तमाम गाथाएं।
तुम जानने लगोगे कि "पशु" से "मनुष्य" में बदलने की प्रक्रिया कितनी धीमी थी और यहभी समझ लोगे कि आज कितनी जल्दी बदल जाते हैं लोग "मनुष्य" से "पशु" में...............(संतोष मिश्रा)